कुरान - 22:38 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

38
۞إِنَّ ٱللَّهَ يُدَٰفِعُ عَنِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ خَوَّانٖ كَفُورٍ

Transliteration: (Innal laaha yudaafi' 'anil lazeena aamanoo; innal laaha laa yuhibbu kulla khawwaanin kafoor (section 5))

38. बेशक अल्लाह उन लोगों की तरफ़ से (बलाओं व दुश्मनों का) दिफ़ाअ फ़रमाता है जो ईमान लाए हैं [88]; बेशक अल्लाह किसी ख़ियानत करने वाले, नाशुकरे को पसंद नहीं करता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 38 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 38 की तफ़सीर

"बेशक अल्लाह उन लोगों की तरफ़ से (बलाओं व दुश्मनों का) दिफ़ाअ फ़रमाता है जो ईमान लाए हैं [88]; बेशक अल्लाह किसी ख़ियानत करने वाले, नाशुकरे को पसंद नहीं करता।"

[88] मोमिनीन से बलाओं व आफ़ात का दिफ़ाअ

अल्लाह तआला अपने ईमानदार बन्दों की हिफ़ाज़त दुश्मनों के शर और मुसीबतों से फ़रमाता है:

  • कभी उनके नेक आमाल की बरकत से।

  • कभी अपने महबूब व मुक़र्रब बन्दों (औलिया व सुल्हा) के वसीले व बरकत से।

  • और कभी ख़ालिस अपने लुत्फ़ व करम से।

यह हिफ़ाज़त दुनिया में भी होती है और आख़िरत में भी। लेकिन जो लोग अमानत में ख़ियानत करते हैं और अल्लाह की नेमतों की ना-शुक्री करते हैं, वे अल्लाह की रहमत और महबूबियत से महरूम रहते हैं।

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