Transliteration: (Walbudna ja'alnaahaa lakum min sha'aaa'iril laahi lakum feehaa khairun fazkurusmal laahi 'alaihaa sawaaff; fa izaa wajabat junoobuhaa fakuloo minhaa wa at'imul qaani'a walmu'tarr; kazaalika sakhkharnaahaa lakum la'allakum tashkuroon)
"और (क़ुर्बानी के) बड़े जानवरों (ऊंट और गाय) को [81] हमने तुम्हारे लिए अल्लाह के शआइर (निशानियों) में से बनाया है [82], तुम्हारे लिए उनमें बड़ी भलाई है [83]; पस जब वे (क़ुर्बानी के लिए) तीन पांव पर खड़े और एक पांव बंधे हों तो उन पर अल्लाह का नाम लो [84]; फिर जब उनके पहलू ज़मीन पर आ गिरें (ज़ब्ह हो जाएं), तो तुम खुद भी उसमें से खाओ और सब्र से बैठने वाले (ग़रीब) को भी खिलाओ और सवाल करने वाले (मुहताज) को भी [85]; इसी तरह हमने उन्हें तुम्हारे ताबेअ कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो [86] ।"
क़ुर्बानी के जानवरों—ख़ासकर ऊंट और गाय—को अल्लाह के शआइर में शुमार किया गया। उनकी ताज़ीम करना (उन्हें अच्छा चारा खिलाना, ख़िदमत करना और सजाना) मुस्तहब और बाइसे अज्र है। क़ुर्बानी सिर्फ़ मक्के ही में मख़सूस नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मोमिनीन के लिए मशरूअ है।
दुनियावी तौर पर गोश्त, चर्बी और ख़ाल का फ़ायदा है और दीनी तौर पर आख़िरत में अल्लाह की रज़ा और अज़ीम सवाब हासिल होता है।
ऊंट को ज़ब्ह करने का मसनून तरीक़ा यह है कि उसका बायां अगला पांव बांध दिया जाए और वह तीन पांव पर खड़ा हो, फिर उसके सीने के ऊपर हल्क़ूम में नैज़ा या छुरी मारी जाए (जिसे 'नह्र' कहते हैं)। गाय और बकरी को लिटा कर ज़ब्ह किया जाता है।
ज़ब्ह होने के बाद खुद भी खाएं, और 'क़ानिअ' (वह ग़रीब जो सब्र से बैठा रहे और सवाल न करे) को भी दें, और 'मुअ़तर्र' (जो सवाल करे) उसे भी खिलाएं।
ऊंट जैसा भारी-भरकम और ताक़तवर जानवर एक छोटे बच्चे के इशारे पर झुक जाता है, जबकि एक छोटी सी मक्खी भी इंसान के क़ाबू में नहीं आती। यह अल्लाह की अज़ीम क़ुदरत है कि उसने इतने बड़े जानवरों को तुम्हारे ताबेअ कर दिया ताकि तुम उसका शुक्र अदा करो।
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