Transliteration: (Lany yanaalal laaha luhoo muhaa wa laa dimaaa'uhaa wa laakiny yanaaluhut taqwaa minkum; kazaalika sakhkharhaa lakum litukabbirul laaha 'alaa ma hadaakum; wa bashshiril muhsineen)
"अल्लाह को हरगिज़ न तो उनका गोश्त पहुंचता है और न उनका ख़ून, बल्कि उसे तुम्हारा तक़वा (दिल का इख़्लास) पहुंचता है [87]; इसी तरह उसने उन्हें तुम्हारे ताबेअ कर दिया ताकि तुम अल्लाह की बड़ाई बयान करो उस हिदायत पर जो उसने तुम्हें दी; और (ऐ महबूब!) नेकी करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दीजिए!"
ज़माना-ए-जाहिलियत में लोग क़ुर्बानी का ख़ून काबा की दीवारों पर मलते थे और गोश्त काबा के सामने रख देते थे। अल्लाह तआला ने इस आयत में साफ़ फ़रमाया कि अल्लाह इन चीज़ों से बे-नियाज़ है; उसे गोश्त और ख़ून नहीं बल्कि दिलों का इख़्लास और तक़्वा पहुंचता है।
इस आयत से ईसाले सवाब (सवाब पहुंचाना) की अज़ीम दलील साबित होती है। जैसे ज़ाहिरी गोश्त और ख़ून अल्लाह तक नहीं पहुंचता बल्कि उसकी नीयत और तक़्वा बारगाहे इलाही में मक़बूल होता है, वैसे ही अगर कोई इंसान सदक़ा, क़ुर्बानी या तिलावते क़ुरआन करके उसका सवाब अपने मरहूमीन को बख़्शे, तो वह सवाब अल्लाह तआला रूहों तक पहुंचा देता है (जैसा कि हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी ने 'जा अल-हक़' में तफ़सील से साबित फ़रमाया है)।
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