कुरान - 22:34 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
وَلِكُلِّ أُمَّةٖ جَعَلۡنَا مَنسَكٗا لِّيَذۡكُرُواْ ٱسۡمَ ٱللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّنۢ بَهِيمَةِ ٱلۡأَنۡعَٰمِۗ فَإِلَٰهُكُمۡ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞ فَلَهُۥٓ أَسۡلِمُواْۗ وَبَشِّرِ ٱلۡمُخۡبِتِينَ

Transliteration: (Wa likulli ummatin ja'alnaa mansakal liyazkurus mal laahi 'alaa maa razaqahum mim baheematil an'aam; failaahukum ilaahunw Waahidun falahooo aslimoo; wa bashshiril mukhbiteen)

34. और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी का एक तरीक़ा मुक़र्रर फ़रमाया [77] ताकि वे उन चौपाया जानवरों पर अल्लाह का नाम लें जो उसने उन्हें अता किए हैं; पस तुम्हारा माबूद बस एक ही माबूद है [78], लिहाज़ा उसी के फ़रमांबरदार बन जाओ; और (ऐ महबूब!) उन आजिज़ (दिल से झुकने वाले) बन्दों को ख़ुशख़बरी दे दीजिए; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 34 की तफ़सीर

"और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी का एक तरीक़ा मुक़र्रर फ़रमाया [77] ताकि वे उन चौपाया जानवरों पर अल्लाह का नाम लें जो उसने उन्हें अता किए हैं; पस तुम्हारा माबूद बस एक ही माबूद है [78], लिहाज़ा उसी के फ़रमांबरदार बन जाओ; और (ऐ महबूब!) उन आजिज़ (दिल से झुकने वाले) बन्दों को ख़ुशख़बरी दे दीजिए;"

[77] क़ुर्बानी की क़दीम तारीख़

क़ुर्बानी सिर्फ़ उम्मते मुहम्मदिया के लिए ही नहीं बल्कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के बेटों (हाबील व क़ाबील) के दौर से लेकर हर नबी की उम्मत में जारी रही है। यह एक क़दीम तरीन इबादत है जिसे अल्लाह ने अपनी फ़रमांबरदारी का इम्तिहान बनाया।

[78] ज़बीहे पर सिर्फ़ अल्लाह का नाम

माबूदे बरहक़ सिर्फ़ अल्लाह है, लिहाज़ा जानवर ज़ब्ह करते वक़्त सिर्फ़ उसी का नाम लिया जाए। अगर जानबूझकर अल्लाह का नाम छोड़ दिया जाए या किसी ग़ैर के नाम पर ज़ब्ह किया जाए, तो वह जानवर हराम हो जाता है। भूले से छूट जाए तो अल्लाह माफ़ फ़रमाता है।

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