कुरान - 15:88 सूरह अल-हिज्र अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

88
لَا تَمُدَّنَّ عَيۡنَيۡكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعۡنَا بِهِۦٓ أَزۡوَٰجٗا مِّنۡهُمۡ وَلَا تَحۡزَنۡ عَلَيۡهِمۡ وَٱخۡفِضۡ جَنَاحَكَ لِلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Laa tamuddanna 'ainaika ilaa maa matta 'naa biheee azwaajam minhum wa laa tahzan 'alaihim wakhfid janaahaka lilmu 'mineen)

अपनी आँख उठाकर उस चीज़ को न देखिए जो हमने काफ़िरों के कुछ जोड़ों को बरतने को दी [101], और उन पर ग़म न खाइए, और ईमान वालों के लिए अपनी रहमत का बाज़ू बिछाइए [102]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हिज्र आयत 88 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हिज्र – आयत 88 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

अपनी आँख उठाकर उस चीज़ को न देखिए जो हमने काफ़िरों के कुछ जोड़ों को बरतने को दी [101], और उन पर ग़म न खाइए, और ईमान वालों के लिए अपनी रहमत का बाज़ू बिछाइए [102]।

[101] काफ़िरों की दुनियावी दौलत से बे-नियाज़ी

मोमिन को काफ़िरों की दुनियावी दौलत व चमक-दमक को रश्क या हसरत की नज़र से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि ईमान के मुक़ाबले में दुनिया की कोई हैसियत नहीं है। ग़रीब मोमिन भी अपने ईमान की वजह से दुनिया के मालदार काफ़िरों से कहीं ज़्यादा इज़्ज़त व शरफ़ का मालिक है।

[102] मोमिनीन पर शफ़क़त और रहमत का साया

शाने-नुज़ूल: जब यहूदियों के सात बड़े मालदार तिजारती क़ाफ़िले मक्का पहुँचे, तो कुछ ग़रीब मुसलमानों के दिल में ख़याल गुज़रा कि काश हमारे पास भी ऐसा माल होता। इस पर यह आयत उतरी और हुज़ूर ﷺ को हुक्म हुआ कि ग़रीब मोमिनों के साथ नर्मी, शफ़क़त और वात्सल्य (रहमत का बाज़ू बिछाना) का सुलूक फ़रमाएँ।

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