कुरान - 3:112 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

112
ضُرِبَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلذِّلَّةُ أَيۡنَ مَا ثُقِفُوٓاْ إِلَّا بِحَبۡلٖ مِّنَ ٱللَّهِ وَحَبۡلٖ مِّنَ ٱلنَّاسِ وَبَآءُو بِغَضَبٖ مِّنَ ٱللَّهِ وَضُرِبَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡمَسۡكَنَةُۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَانُواْ يَكۡفُرُونَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَيَقۡتُلُونَ ٱلۡأَنۢبِيَآءَ بِغَيۡرِ حَقّٖۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَواْ وَّكَانُواْ يَعۡتَدُونَ

Transliteration: (Duribat 'alaihimuz zillatu aina maa suqifooo illaa bihablim minal laahi wa hablim minan naasi wa baaa'oo bighadabim minallaahi wa duribat 'alaihimul maskanah; zaalika bi-annahum kaanoo yakfuroona bi Aayaatil laahi wa yaqtuloonal Ambiyaaa'a bighairi haqq; zaalika bimaa 'asaw wa kaanoo ya'tadoon)

ज़िल्लत उन पर थोपी गई है [245] जहाँ कहीं भी हों, वे किसी सुरक्षा में नहीं रह सकते [246], सिवाय अल्लाह की रस्सी और लोगों की रस्सी के (यानी संधि और संरक्षण के) [247]। उन्होंने अल्लाह के ग़ज़ब को अपने ऊपर मोल ले लिया है, और उन पर तबाही लिख दी गई है [248]। यह इसलिए है क्योंकि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते थे और नबीों को नाहक़ क़त्ल करते थे [249]। उनका यह अंजाम उनकी अवज्ञा और हद से बढ़ने के कारण हुआ। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 112 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 112 की तफ़्सीर

 

✅ [245] यहूदियों पर थोप दी गई ज़िल्लत

इस आयत में जिस ज़िल्लत का ज़िक्र है, वह उन अहले किताब पर लागू होती है जो रसूलुल्लाह ﷺ के ज़माने में मौजूद थे और हक़ को न माना। लेकिन यह हुक्म आम तौर पर तमाम यहूदियों पर लागू होता है, जिनकी हालत हमेशा तहक़ीर और पस्ती की मिसाल बनती रही है। अगर उन्होंने कभी कोई सरकार क़ायम भी की, तो वह अस्थायी रही। अल्लाह की मर्ज़ी हो, तो उन्हें फिर ज़िल्लत का सामना करना पड़ता है, जैसे कोई कमज़ोर पहलवान ताक़तवर के सामने रुस्वा हो। आज की यहूदी हुकूमत (फ़िलस्तीन में) भी, अगर अल्लाह चाहे, तो बड़ी ज़िल्लत का मुख़दमा साबित हो सकती है।

✅ [246] अल्लाह की नाफ़रमानी करने वालों के लिए ज़िल्लत

यह ज़िल्लत उन यहूदियों पर है जिन्होंने पूरी तरह अल्लाह की नाफ़रमानी की। इसका मतलब यह है कि हर यहूदी पर यह हुक्म नहीं लागू होता, बल्कि वही इसके हक़दार हैं जो खुले तौर पर गुमराही अपनाते हैं। अगर किसी यहूदी हुकूमत का वजूद है, तो वह इस आयत के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उसकी तशरीह है। हदीसों में आख़िरी दौर में मुसलमानों और यहूदियों के बीच जंग की खबरें हैं, जहाँ पत्थर तक यहूदियों की निशानदेही करेंगे — और यह तभी मुमकिन होगा जब उनका कोई वजूद बाक़ी होगा।

✅ [247] बाहरी सहारे पर निर्भर जीवन

"अल्लाह की रस्सी और लोगों की रस्सी" से मुराद है — संधियाँ और बाहरी संरक्षण। यहूदियों की हिफ़ाज़त अक्सर दूसरी ताक़तों के भरोसे रही है — चाहे मुसलमान हों या नसरानी। आज भी उनकी हुकूमत अमेरिका जैसे ताक़तवर मुल्कों पर निर्भर है। वह सिर्फ़ नाम की हुकूमत रखते हैं, असली ताक़त और सहारा बाहरी ताक़तों का है।

✅ [248] दौलत के बावजूद बे-चैनी

ज़ाहिरी दौलत और संसाधनों के बावजूद यहूदी क़ौम सुकून से महरूम है। उनका ज़िंदगी का अंदाज़ तंगदिली और नाक़ामी से भरा होता है। बाहर से मालदार दिखते हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर फ़क़ीर और मायूस, रूहानी क़ल्बी सुकून से खाली।

✅ [249] नबियों का नाहक़ क़त्ल और आयतों का इनकार

यहूदी नबियों को नाहक़ क़त्ल करने का गुनाह अंजाम दे चुके हैं, जिसे उन्होंने गलत दलीलों से जायज़ ठहराने की कोशिश की। लेकिन किसी भी नबी का क़त्ल सबसे बड़ा ज़ुल्म है, और इस आयत में यह साफ़ कर दिया गया है कि यही ज़ुल्म और अल्लाह की निशानियों के इनकार की वजह से उन पर अल्लाह का ग़ज़ब और हलाकत आई।

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