Transliteration: (Laisoo sawaaa'a; min Ahlil Kitaabi ummatun qaaa'imatuny yatloona Aayaatil laahi aanaaa'al laili wa hum yasjudoon)
जब हज़रत अब्दुल्लाह इब्न सलाम और उनके साथियों ने इस्लाम क़बूल किया, तो यहूद ने उनका मज़ाक़ उड़ाया और उन्हें बदबख़्त और गुमराह कहा। उनका दावा था कि अगर ये लोग नेक होते, तो कभी इस्लाम न अपनाते। यह आयत उन झूठे दावों को रद्द करती है, और बताती है कि असल में यही लोग सबसे ज़्यादा सीधे और नेक रास्ते पर हैं।
इस्लाम लाने के बाद ये लोग तहज्जुद की नमाज़ और रात में क़ुरआन की तिलावत में मुस्तक़िल रहे। इससे यह साबित होता है कि तहज्जुद की नमाज़ इबादतों में खास दर्जा रखती है। और सजदा नमाज़ का सबसे आला रुक्न है।
रात में इबादत और तिलावत, दिन की इबादत से ज्यादा अफ़ज़ल होती है, क्योंकि रात का सुकून और एकाग्रता अलाहिदा दर्जे की होती है।
ध्यान रहे कि "वह सजदा करते हैं" वाले जुमले में वाव (وَ) शर्तिया नहीं है, क्योंकि सजदे में तिलावत नहीं होती। और आयत का मतलब पूरी रात जागने की हिदायत नहीं, बल्कि रात के कुछ हिस्से में इबादत करना है। हालांकि, कुछ औलिया रात भर इबादत करते थे, जो उनके रूहानी मक़ाम से ताल्लुक रखता था।
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