Transliteration: (Wa maa yaf'aloo min khairin falai yukfarooh; wallaahu 'aleemun bilmuttaqeen)
इस आयत से यह मालूम होता है कि कोई ग़ैर-मुस्लिम दुनिया में जितने भी अच्छे काम कर ले, आख़िरत में वह अल्लाह की मग़फ़िरत या रहमत का हक़दार नहीं हो सकता।
क्योंकि ईमान (ईमान बिल्लाह) अच्छे अमल की बुनियादी शर्त है — जैसे कि नमाज़ के लिए वुज़ू ज़रूरी है। अगर अस्ल (ईमान) ही काट दी जाए, तो फिर शाख़ों (नेक अमाल) को सींचने का कोई फायदा नहीं होता — वे बेकार और बेअसर हो जाते हैं।
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