कुरान - 3:13 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

13
قَدۡ كَانَ لَكُمۡ ءَايَةٞ فِي فِئَتَيۡنِ ٱلۡتَقَتَاۖ فِئَةٞ تُقَٰتِلُ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَأُخۡرَىٰ كَافِرَةٞ يَرَوۡنَهُم مِّثۡلَيۡهِمۡ رَأۡيَ ٱلۡعَيۡنِۚ وَٱللَّهُ يُؤَيِّدُ بِنَصۡرِهِۦ مَن يَشَآءُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَعِبۡرَةٗ لِّأُوْلِي ٱلۡأَبۡصَٰرِ

Transliteration: (Qad kaana lakum Aayatun fee fi'atainil taqataa fi'atun tuqaatilu fee sabeelil laahi wa ukhraa kaafiratuny yarawnahum mislaihim ra' yal 'ayn; wallaahu yu'ayyidu bi nasrihee mai yashaaa'; innaa fee zaalika la 'ibratal li ulil absaar)

13. निश्चय ही, तुम्हारे लिए उन दो फौजों में एक निशानी है [22] जो भिड़ीं (बदर की लड़ाई में)। एक फौज, जो अल्लाह की राह में लड़ रही थी, और दूसरी फौज, जो काफ़िरों की थी [23]। वे (काफ़िर) अपनी आँखों से देख रहे थे [24]। मगर अल्लाह अपनी जीत से जिसे चाहे सहायता करता है। इसमें समझदार लोगों के लिए एक सीख [25] है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 13 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [22] बदर की लड़ाई एक इलाही निशानी
यह आयत उस लड़ाई की ओर इशारा करती है जो रमजान के महीने में, 2 हिज्री में, शुक्रवार को लड़ी गई थी। यह इस्लामी इतिहास की शुरुआती और निर्णायक लड़ाइयों में से एक थी। मुसलमानों की संख्या केवल 313 थी, जिनके पास बहुत सीमित संसाधन थे:

  • केवल 2 घोड़े
  • 6 कवच
  • 8 तलवारें
  • 17 ऊँट
    इन सीमित साधनों के बावजूद, मुसलमानों ने बड़ी जीत हासिल की और अच्छी तरह सुसज्जित क़ुरैश की फौज को हराया। यह चमत्कार अल्लाह की ताक़त और मदद की एक स्पष्ट निशानी है।

✅ [23] काफ़िरों की ताक़त उन्हें बचा नहीं सकी
क़ुरैश की सेना, जिसका नेतृत्व उतबा बिन रबिआह कर रहे थे, लगभग 950 सैनिकों की थी, जिनके पास:

  • 100 घोड़े
  • 700 ऊँट
  • बड़ी मात्रा में हथियार और सामान
    था।
    फिर भी, इन भारी सैन्य संसाधनों के बावजूद, काफ़िर हराए गए। उन्हें ऐसा लगा कि मुसलमान उनकी संख्या से दोगुने हैं, जिससे उनके मन में डर और भ्रम फैल गया।

✅ [24] दृष्टि में चमत्कार: दोगुनी संख्या का प्रभाव
अल्लाह ने उस लड़ाई के दौरान हुए एक चमत्कार का ज़िक्र किया है:
काफ़िरों ने मुसलमानों को अपनी आँखों से उनके वास्तविक संख्या से दोगुना देखा।
इस धारणा ने क़ुरैश के मन में भय और हताशा उत्पन्न की, जबकि वास्तव में मुसलमान कम थे। यह इलाही हस्तक्षेप था जो विश्वासियों को बढ़त देने के लिए हुआ।

✅ [25] जीत का असली स्रोत: ईमान और इलाही सहायता
इस आयत से हम समझते हैं कि:

  • जीत संख्या या हथियारों पर निर्भर नहीं करती।
  • सच्ची सफलता परहेज़गारी, अल्लाह पर भरोसा, और लगातार याद (धिकर) में है।
    अल्लाह ने अन्य जगह भी कहा है: "जब तुम किसी फौज से सामना करो, डटकर मुकाबला करो और अल्लाह का ज़्यादा ज़िक्र करो..." (सूरा अल-अनफ़ाल, 8:45)
    यह मुसलमानों के लिए एक कालजयी सीख है: जो लोग अल्लाह पर भरोसा रखते हैं और उसकी राह में कोशिश करते हैं, उन्हें भारी विरोध के बावजूद जीत मिलती है। बदर की घटना समझदार लोगों के लिए एक निशानी है, जो उन्हें याद दिलाती है कि असली ताक़त इलाही मदद ही है।

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