कुरान - 3:11 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
كَدَأۡبِ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَا فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ بِذُنُوبِهِمۡۗ وَٱللَّهُ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ

Transliteration: (Kadaabi Aali Fir'awna wallazeena min qablihim; kazzaboo bi Aayaatinaa fa akhazahumul laahu bizunoo bihim; wallaahu shadeedul 'iqaab)

11. (उनका अंजाम) फ़िरऔन की क़ौम और उनसे पहले वालों की तरह हुआ। उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया [19], तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों की वजह से पकड़ लिया। और अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [19] रसूलों का इंकार तबाही की वजह बनता है
इस आयत में तीन महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दी गई हैं:

  1. दुनियावी ताक़त अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकती।
    • फ़िरऔन और उसकी क़ौम के पास सत्ता, सेना, और ख़ज़ाने थे — फिर भी वे अल्लाह के अज़ाब से नहीं बच सके।
    • यह सबक है कि कोई भी ताक़त अल्लाह के सामने बेकार है।
  2. रसूलों का इंकार हलाकत (तबाही) को निश्चित कर देता है।
    • फ़िरऔन लंबे समय तक खुद को ख़ुदा कहलाता रहा, मगर उसे फ़ौरन नहीं मारा गया।
    • अल्लाह का अज़ाब तब आया जब उसने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को झुठलाया।
  3. अल्लाह बिना चेतावनी के क़ौम को सज़ा नहीं देता।
    • पहले रसूल भेजे जाते हैं, साफ़ हिदायत दी जाती है, फिर अगर इंकार किया जाए — तभी सज़ा आती है।
    • यह अल्लाह की इंसाफ़पसंदी (न्यायप्रियता) का सुबूत है।

🔸 इस सिद्धांत को क़ुरआन की दूसरी आयत में भी दोहराया गया है —
"हम किसी बस्ती को अज़ाब नहीं देते जब तक कि उसमें एक रसूल न भेज दें।" (सूरह अल-इसरा 17:15)

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