कुरान - 3:140 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

140
إِن يَمۡسَسۡكُمۡ قَرۡحٞ فَقَدۡ مَسَّ ٱلۡقَوۡمَ قَرۡحٞ مِّثۡلُهُۥۚ وَتِلۡكَ ٱلۡأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيۡنَ ٱلنَّاسِ وَلِيَعۡلَمَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَيَتَّخِذَ مِنكُمۡ شُهَدَآءَۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Iny-yamsaskum qarhum faqad massal qawma qarhum misluh; wa tilkal ayyaamu nudaawiluhaa bainan naasi wa liya'lamal laahul lazeena aamanoo wa yattakhiza minkum shuhadaaa'; wallaahu laa yuh ibbuz zaalimeen)

अगर तुम पर ज़ख़्म आया है, तो यक़ीनन उसी तरह का ज़ख़्म दूसरों को भी लगा है [295]। और ये दिन हम लोगों के दरमियान अदला-बदली करते रहते हैं [296], ताकि अल्लाह सच्चे ईमान वालों को अलग कर दे और तुममें से कुछ को शहीद बना ले [297]; और अल्लाह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता [298]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 140 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 140 की तफ़्सीर

 

✅ [295] मुसीबतें एकतरफ़ा नहीं होतीं

इस आयत में मोमिनों से कहा गया है: अगर तुम्हें उहुद की जंग में चोटें आई हैं, तो काफ़िरों को भी बद्र की जंग में ऐसी ही तकलीफ़ें पहुँची थीं। उन्होंने हार के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी, तो तुम क्यों मायूस हो? इससे हमें सीख मिलती है कि मुसलमानों को हिम्मत और हौसले के साथ डटे रहना चाहिए, और याद रखना चाहिए कि दुश्मन भी तकलीफ़ों और नुक़सान का सामना करते हैं।

✅ [296] ताक़त और कमज़ोरी का चक्र

यह आयत बताती है कि किसी भी क़ौम की ताक़त या कमजोरी एक जैसा नहीं रहती — ये सब अल्लाह की हिकमत के तहत होता है। जैसे पेड़ कभी सूखा होता है, कभी हरा-भरा, और चाँद कभी कम तो कभी पूरा, उसी तरह किसी क़ौम के पास हमेशा ताक़त नहीं रहती। ये दुनियावी इम्तिहानों का हिस्सा है।

✅ [297] शिकस्त भी इनाम बन सकती है

इस आयत से यह हक़ीक़त सामने आती है कि अगर मुसलमान हार भी जाएं, तो भी उनके लिए इज़्ज़त का ज़रिया होती है। अगर जीतें, तो बहादुर कहलाते हैं; और अगर शहीद हो जाएं, तो शहादत का मुक़ाम पाते हैं। इस तरह जीत या हार — दोनों ही अल्लाह की तरफ़ से इम्तिहान हैं, जो असली मोमिन और झूठे लोगों में फ़र्क करते हैं।

✅ [298] ज़ालिम: काफ़िर और गुनहगार

क़ुरआन में "ज़ालिम" शब्द कभी काफ़िरों और कभी गुनहगारों के लिए इस्तेमाल होता है। इस आयत में यह काफ़िरों के लिए है, क्योंकि इसका मुक़ाबला मोमिनों से किया गया है। इससे यह साबित होता है कि कोई काफ़िर चाहे जितने अच्छे काम कर ले, मगर जब तक वह अल्लाह और उसके दीन को नहीं मानता, अल्लाह की मुहब्बत नहीं पा सकता।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now