कुरान - 3:167 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

167
وَلِيَعۡلَمَ ٱلَّذِينَ نَافَقُواْۚ وَقِيلَ لَهُمۡ تَعَالَوۡاْ قَٰتِلُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ أَوِ ٱدۡفَعُواْۖ قَالُواْ لَوۡ نَعۡلَمُ قِتَالٗا لَّٱتَّبَعۡنَٰكُمۡۗ هُمۡ لِلۡكُفۡرِ يَوۡمَئِذٍ أَقۡرَبُ مِنۡهُمۡ لِلۡإِيمَٰنِۚ يَقُولُونَ بِأَفۡوَٰهِهِم مَّا لَيۡسَ فِي قُلُوبِهِمۡۚ وَٱللَّهُ أَعۡلَمُ بِمَا يَكۡتُمُونَ

Transliteration: (Wa liya'lamal lazeena naafaqoo; wa qeela lahum ta'aalaw qaatiloo fee sabeelil laahi awid fa'oo qaaloo law na'lamu qitaalallat taba'naakum; hum lilkufri yawma'izin aqrabu minhum lil eemaan; yaqooloona bi afwaahihim maa laisa fee quloobihim; wallaahu a'lamu bimaa yaktumoon)

और ताकि वह मुनाफ़िक़ों को अलग कर दे [378] — जिन्हें कहा गया: "आओ अल्लाह की राह में लड़ो या (कम से कम) दुश्मन को ही रोको" [379]। उन्होंने कहा: "अगर हमें लड़ना आता, तो हम तुम्हारे साथ होते।" उस दिन वे ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र से ज़्यादा क़रीब थे [380] — वे अपने मुँह से वह कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं था [381], और अल्लाह जानता है जो वे छुपा रहे थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 167 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 167 की तफ़्सीर

 

✅ [378] उहुद की जंग ने मुनाफ़िक़ों को बेनक़ाब कर दिया

उहुद की शिकस्त एक अल्लाही इम्तिहान था,
जिसने सच्चे मोमिनों और मुनाफ़िक़ों के बीच फ़र्क़ साफ़ कर दिया।
जो मैदान में जमे रहे, उन्होंने ईमान की सच्चाई साबित की,
और जो भाग गए या तौहीनअमेज़ बातें करने लगे, वे मुनाफ़िक़ साबित हुए।

सुभानअल्लाह! सहाबा की ज़ाहिरी ग़लती भी हक़ और बातिल की पहचान बन गई।
जो सहाबा की तौहीन करे, वह मुनाफ़िक़ है,
और जो उनका अदब करे, वह सच्चा मोमिन है।
यह जंग क़ियामत तक ईमान और निफ़ाक़ के बीच एक पैमाना बनी रहेगी।

✅ [379] दुश्मन के मुक़ाबले में खड़ा होना भी इबादत है

इससे यह मालूम हुआ कि:

  • जिहाद सिर्फ तलवार से नहीं,
    बल्कि दुश्मन के मुक़ाबले में जम जाना भी अल्लाह की राह में इबादत है।
  • बिना शरई उज्र के जंग से बचना मुनाफ़िक़ी की निशानी है।
  • "हमें लड़ना नहीं आता" जैसे बहाने,
    मुनाफ़िक़ों का तौर-तरीका है।
    मुसलमानों को ऐसी बुज़दिली और बहानों से बचना चाहिए।

✅ [380] झूठे दावे, अंदर से कुफ़्र

इन मुनाफ़िक़ों ने ज़ाहिरी तौर पर ईमान का दावा किया,
मगर हक़ीक़तन वे उस दिन कुफ़्र से ज़्यादा क़रीब थे।
उनके दिल अल्लाह और उसके रसूल से दूर,
मगर ज़ुबान से वफ़ादारी के दावे कर रहे थे।

यह साबित करता है कि:

  • बातनी ईमान, ज़ाहिरी दावों से ज़्यादा अहम होता है।
  • मुनाफ़िक़ बाहर से मुसलमानों के क़रीब लग सकते हैं,
    मगर अंदर से वे काफ़िरों से जुड़े होते हैं।

मिसाल: अबू जहल, ज़ाहिरी तौर पर रसूल ﷺ के बहुत क़रीब था,
मगर रूहानी तौर पर बहुत दूर।
जबकि हज़रत ओवैस क़रनी (रज़ि.),
जो शरीरी तौर पर दूर थे,
मगर ईमान की वजह से बेहद क़रीब।

✅ [381] बहानों के पीछे छुपे मक़सद

बाहरी तौर पर मुनाफ़िक़ों ने कहा कि उन्हें लड़ाई नहीं आती,
मगर हक़ीक़त यह थी कि वे काफ़िरों से टकराव से डरते थे,
और चाहते थे कि दुश्मन मुसलमानों पर ग़ालिब आ जाए।

ऐसे मुनाफ़िक़ हमेशा उम्मत के अंदर रहे हैं और रहेंगे।
उनकी ज़बानें कुछ और बोलती हैं, मगर दिलों में धोखा छुपा होता है।
अल्लाह उनके इरादों को जानता है —
और हर धोखे का हिसाब ज़रूर लेगा।

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