Transliteration: (Wa liya'lamal lazeena naafaqoo; wa qeela lahum ta'aalaw qaatiloo fee sabeelil laahi awid fa'oo qaaloo law na'lamu qitaalallat taba'naakum; hum lilkufri yawma'izin aqrabu minhum lil eemaan; yaqooloona bi afwaahihim maa laisa fee quloobihim; wallaahu a'lamu bimaa yaktumoon)
उहुद की शिकस्त एक अल्लाही इम्तिहान था,
जिसने सच्चे मोमिनों और मुनाफ़िक़ों के बीच फ़र्क़ साफ़ कर दिया।
जो मैदान में जमे रहे, उन्होंने ईमान की सच्चाई साबित की,
और जो भाग गए या तौहीनअमेज़ बातें करने लगे, वे मुनाफ़िक़ साबित हुए।
सुभानअल्लाह! सहाबा की ज़ाहिरी ग़लती भी हक़ और बातिल की पहचान बन गई।
जो सहाबा की तौहीन करे, वह मुनाफ़िक़ है,
और जो उनका अदब करे, वह सच्चा मोमिन है।
यह जंग क़ियामत तक ईमान और निफ़ाक़ के बीच एक पैमाना बनी रहेगी।
इससे यह मालूम हुआ कि:
इन मुनाफ़िक़ों ने ज़ाहिरी तौर पर ईमान का दावा किया,
मगर हक़ीक़तन वे उस दिन कुफ़्र से ज़्यादा क़रीब थे।
उनके दिल अल्लाह और उसके रसूल से दूर,
मगर ज़ुबान से वफ़ादारी के दावे कर रहे थे।
यह साबित करता है कि:
मिसाल: अबू जहल, ज़ाहिरी तौर पर रसूल ﷺ के बहुत क़रीब था,
मगर रूहानी तौर पर बहुत दूर।
जबकि हज़रत ओवैस क़रनी (रज़ि.),
जो शरीरी तौर पर दूर थे,
मगर ईमान की वजह से बेहद क़रीब।
बाहरी तौर पर मुनाफ़िक़ों ने कहा कि उन्हें लड़ाई नहीं आती,
मगर हक़ीक़त यह थी कि वे काफ़िरों से टकराव से डरते थे,
और चाहते थे कि दुश्मन मुसलमानों पर ग़ालिब आ जाए।
ऐसे मुनाफ़िक़ हमेशा उम्मत के अंदर रहे हैं और रहेंगे।
उनकी ज़बानें कुछ और बोलती हैं, मगर दिलों में धोखा छुपा होता है।
अल्लाह उनके इरादों को जानता है —
और हर धोखे का हिसाब ज़रूर लेगा।
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