Transliteration: (Wa laa tahsabannal lazeena qutiloo fee sabeelillaahi amwaata; bal ahyaaa'un 'inda Rabbihim yurzaqoon)
इस आयत में अल्लाह की राह में शहीद होने वालों की पाँच अलग-अलग विशेषताएँ बयान की गई हैं: उन्हें हमेशा की ज़िंदगी प्राप्त है, वे अल्लाह के क़रीब हैं, उन्हें लगातार रोज़ी मिलती रहती है, वे दुनिया और उसमें होने वाले हालात से पूरी तरह वाक़िफ़ होते हैं, और उनकी ज़िंदगी दूसरों से कहीं अधिक मुकम्मल और बुलंद होती है। यह ज़िंदगी किसी अजन्मे बच्चे, नवजात शिशु, बीमार, सोते हुए या क़ैदी की सीमित ज़िंदगी जैसी नहीं होती — बल्कि शहीदों की हस्ती शान, ताक़त और मुकम्मल हयात से भरपूर होती है। अह्या'उन में जो तनवीन है, वह इज़्ज़त और तअज़ीम के लिए है। यह भी कहा गया है कि दुनिया में शहीद की रूह क़ैद होती है, मगर शहादत के बाद वह एक क़दम में मदीना पहुँच सकती है — यह उसकी रूहानी रफ़्तार और मर्तबा बताता है।
हालाँकि यह आयत ख़ास तौर पर शहीद-ए-उहुद के लिए उतरी, लेकिन इसका लफ़्ज़ी अंदाज़ इस पर क़ियामत तक के हर शहीद को शामिल करता है। इसलिए हर वह व्यक्ति जो अल्लाह की राह में शहीद हो — हमेशा की ज़िंदगी पाता है। उनकी जिस्मानी और रूहानी हयात क़ायम रहती है। यही वजह है कि बहुत बार देखा गया कि शहीदों के जिस्म क़ब्र में सड़ा नहीं करते। हाँ, यह ज़िंदगी हमारी आम समझ और तजुर्बे से बाहर है। इसी वजह से शहीदों के कुछ ग़ुस्ल-जनाज़ा वग़ैरह के अहकाम अलग होते हैं। इसका तफ़्सीली बयान तफ़्सीर नअिमी के दूसरे पारे में मौजूद है।
यहाँ जो रोज़ी मिलना कहा गया है, वह सिर्फ़ रूहानी सुकून या क़ब्र की नेमतें नहीं, बल्कि जन्नत के असल फल और लज़्ज़तें मुराद हैं। शहीदों की रूहें हरे-हरे परिंदों की सूरत में जन्नत में घूमती हैं, और वहाँ की नेमतों से ख़ुशी-ख़ुशी लुत्फ़ उठाती हैं। वे खाते-पीते हैं और अल्लाह की दी हुई रहमतों और करम से लज़्ज़त और आराम में रहते हैं। यही उनका इनाम है, जो उन्हें अल्लाह की राह में अपनी जान देने के बदले मिला।
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