कुरान - 3:168 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

168
ٱلَّذِينَ قَالُواْ لِإِخۡوَٰنِهِمۡ وَقَعَدُواْ لَوۡ أَطَاعُونَا مَا قُتِلُواْۗ قُلۡ فَٱدۡرَءُواْ عَنۡ أَنفُسِكُمُ ٱلۡمَوۡتَ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ

Transliteration: (Allazeena qaaloo li ikhwaanihim wa qa'adoo law ataa'oonaa maa qutiloo; qul fadra'oo'an anfusikumul mawta in kuntum saadiqeen)

वो लोग जो अपने भाइयों के बारे में कहते थे [382], जबकि वे खुद पीछे रह गए थे — कि अगर वे हमारी बात मानते, तो मारे न जाते। आप फ़रमाइए: तो अगर तुम सच्चे हो, तो अपनी मौत को टाल कर दिखाओ [383]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 168 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 168 की तफ़्सीर

 

✅ [382] मुनाफ़िक़ों की शहीदों पर ख़ुशी

इस आयत में भाई से मुराद खानदानी रिश्तेदार हैं, न कि ईमानी भाई, क्योंकि जो शहीद हुए वे सच्चे और पक्के मोमिन थे जबकि ये बातें कहने वाले मुनाफ़िक़ थे। उनका यह कहना कि अगर वे हमारी बात मानते तो मारे न जाते, कोई अफ़सोस या दुख का इज़हार नहीं था बल्कि एक ताना और अहंकार भरी टिप्पणी थी। हक़ीक़त तो यह है कि ये मुनाफ़िक़ मुसलमानों की शहादत से अंदर ही अंदर ख़ुश थे और उनकी बातों ने उनके दिलों में छुपे बुग़्ज़ और नफ़रत को ज़ाहिर कर दिया।

✅ [383] मुनाफ़िक़ों को खुला चैलेंज

तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान के मुताबिक़, उसी दिन अब्दुल्लाह बिन उबय ने यह ताना मारा था और उसी दिन सत्तर मुनाफ़िक़ों की मौत हो गई, जो इस बात का खुला जवाब था। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर तुम ये समझते हो कि तुम्हारी बात मानने से मौत टाली जा सकती है, तो अपनी मौत को टाल कर दिखाओ, अगर तुम सच्चे हो। यह बयान मुनाफ़िक़ों की ग़लत सोच का मुंहतोड़ जवाब है और एक साफ़ चेतावनी भी कि मौत और ज़िंदगी का इख़्तियार सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है — ना कोई इसे रोक सकता है, ना आगे-पीछे कर सकता है।

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