Transliteration: (Allazeena qaaloo li ikhwaanihim wa qa'adoo law ataa'oonaa maa qutiloo; qul fadra'oo'an anfusikumul mawta in kuntum saadiqeen)
इस आयत में भाई से मुराद खानदानी रिश्तेदार हैं, न कि ईमानी भाई, क्योंकि जो शहीद हुए वे सच्चे और पक्के मोमिन थे जबकि ये बातें कहने वाले मुनाफ़िक़ थे। उनका यह कहना कि अगर वे हमारी बात मानते तो मारे न जाते, कोई अफ़सोस या दुख का इज़हार नहीं था बल्कि एक ताना और अहंकार भरी टिप्पणी थी। हक़ीक़त तो यह है कि ये मुनाफ़िक़ मुसलमानों की शहादत से अंदर ही अंदर ख़ुश थे और उनकी बातों ने उनके दिलों में छुपे बुग़्ज़ और नफ़रत को ज़ाहिर कर दिया।
तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान के मुताबिक़, उसी दिन अब्दुल्लाह बिन उबय ने यह ताना मारा था और उसी दिन सत्तर मुनाफ़िक़ों की मौत हो गई, जो इस बात का खुला जवाब था। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर तुम ये समझते हो कि तुम्हारी बात मानने से मौत टाली जा सकती है, तो अपनी मौत को टाल कर दिखाओ, अगर तुम सच्चे हो। यह बयान मुनाफ़िक़ों की ग़लत सोच का मुंहतोड़ जवाब है और एक साफ़ चेतावनी भी कि मौत और ज़िंदगी का इख़्तियार सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है — ना कोई इसे रोक सकता है, ना आगे-पीछे कर सकता है।
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