Transliteration: (Allazeena qaala lahumun naasu innan naasa qad jama'oo lakum fakhshawhum fazaadahum emaananw wa qaaloo hasbunal laahu wa ni'malwakeel)
इस आयत से यह मालूम होता है कि ईमान की शिद्दत और सच्चाई इम्तिहानों से बढ़ती है। यह ज़रूरी नहीं कि ईमान की तादाद बढ़े, लेकिन उसका ख़ुलूस और यक़ीन गहरा होता चला जाता है।
जब सच्चे मोमिनों को डराया या धमकाया जाता है, तो वो पीछे नहीं हटते — बल्कि उनका यक़ीन और मजबूत होता है।
डर और मुसीबतें उनके लिए रूहानी तरक़्क़ी का ज़रिया बन जाती हैं। इस तरह की दुनिया की आज़माइशें ईमान वालों के लिए अल्लाह की रहमत होती हैं, जो उन्हें और करीब ले आती हैं।
नाज़िल होने का सबब: यह आयत बद्र की दूसरी जंग के बारे में है, जो 4 हिजरी में, उहुद की जंग के एक साल बाद हुई थी।
उहुद के बाद अबू सुफ़यान ने ऐलान किया था कि अगली जंग बद्र में होगी। मुसलमान तयशुदा वक्त पर बद्र पहुँचे, लेकिन अबू सुफ़यान डर की वजह से नहीं आया।
उसने नुईम बिन मसऊद अशजई को भेजा ताकि मुसलमानों को डराकर वापस भेज सके — उसने कहा कि दुश्मनों की बड़ी फौज आ रही है।
लेकिन ये मक्कारी कामयाब न हो सकी — बल्कि मुसलमानों ने पूरा तवक्कुल दिखाते हुए कहा:
"हमारे लिए अल्लाह काफी है, और वह क्या ही बेहतरीन कारसाज़ है।"
इससे हमें सीख मिलती है कि जब भी कोई परेशानी, डर या खतरा हो — इस आयत को पढ़ना चाहिए।
यह एक मक़बूल और पुर असर दुआ है जो हिम्मत, ईमान और अल्लाह पर पूरी उम्मीद का इज़हार करती है।
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