कुरान - 3:174 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

174
فَٱنقَلَبُواْ بِنِعۡمَةٖ مِّنَ ٱللَّهِ وَفَضۡلٖ لَّمۡ يَمۡسَسۡهُمۡ سُوٓءٞ وَٱتَّبَعُواْ رِضۡوَٰنَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ ذُو فَضۡلٍ عَظِيمٍ

Transliteration: (Fanqalaboo bini'matim minal laahi wa fadlil lam yamsashum sooo'unw wattaba'oo ridwaanal laah; wallaahu zoo fadlin 'azeem)

तो वे लोग अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत के साथ लौटे — उन्हें कोई बुराई छू भी न सकी [394], और उन्होंने अल्लाह की रज़ा को अपनाया। और अल्लाह बड़े फ़ज़्ल वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 174 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 174 की तफ़्सीर

 

✅ [394] बिना जंग के फ़तह और फ़ायदे का इनआम

जब सहाबा कराम मैदान-ए-जंग में पहुँचे और देखा कि अबू सुफ़यान की फौज आई ही नहीं, तो वे सू़क़ बिन कनानाह नामक बाज़ार में गए। वहाँ उन्होंने सौदा-बाज़ारी की और अच्छा मुनाफ़ा कमाया। फिर मदीना वापस लौटे, न केवल दुनियावी फ़ायदा लेकर बल्कि अल्लाह की रज़ामंदी भी हासिल की।

इस सफ़र को "जैशुस-स़वीक़" (फ़ायदे वाला लश्कर) कहा गया। लोग कहने लगे:
इन सहाबा ने ना कोई तकलीफ़ झेली, ना दुश्मन से मुकाबला हुआ, और फिर भी मुनाफ़ा और सवाब दोनों ले आए।

इससे कुछ अहम बातें साबित होती हैं:

  • दीन के सफ़र में कारोबार करना जायज़ है।
  • हज या उमरा जैसे इबादती सफ़रों में व्यापार करना मुमकिन है, और इससे सफ़र की रुहानीयत में कोई कमी नहीं आती।
  • अल्लाह ने इसे “फ़ज़्ल और रहमत” कहा है, जिससे यह साबित होता है कि हैलाल तरीक़े से कमाया हुआ माल, अगर नेक नियत और अल्लाह की इताअत में हो, तो वह मुबारक और नफ़ा बख़्श होता है।

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