Transliteration: (Allazeenas tajaaboo lil laahi war Rasooli mim ba'di maaa asaabahumulqarh; lillazeena ahsanoo minhum wattaqaw ajrun 'azeem)
उहुद की जंग के बाद यह ख़बर फैली कि अबू सुफ़यान फिर से मदीना पर हमला करने की तैयारी में है। उस वक़्त रसूलुल्लाह ﷺ ने एक ऐलान किया कि सब लोग दुश्मन के खिलाफ़ दोबारा चलें।
सभी सहाबा, जो ज़ख़्मी और थके हुए थे, फिर भी हिचकिचाए बिना तैयार हो गए और अपने ज़ख़्मों के साथ हज़रत रसूल ﷺ के साथ निकले। जब वे हमराअल-असद (मदीना से लगभग आठ मील दूर) पहुँचे, तो पता चला कि अबू सुफ़यान डर के मारे पीछे हट गया है।
यह आयत उन बहादुर और वफ़ादार सहाबा की तारीफ़ में नाज़िल हुई। यहाँ यह भी साबित किया गया कि रसूल ﷺ की पुकार को मानना, अल्लाह की पुकार को मानने के बराबर है, जैसा कि आयत कहती है: "अल्लाह और उसके रसूल की पुकार पर लब्बैक कहा"।
"ज़ख़्म लगने के बाद" का जो लफ़्ज़ है, वह सिर्फ़ कुछ लोगों के लिए नहीं, बल्कि तमाम नेक और सच्चे सहाबा के लिए इस्तेमाल हुआ है।
इसमें उन सभी को शरीक किया गया है जिन्होंने इस मुहिम में हिस्सा लिया। यह आयत सिर्फ़ उनके अमल की तारीफ़ नहीं करती, बल्कि उनकी नियत और परहेज़गारी की भी तारीफ़ करती है, जो असल इनाम का सबब बनी।
ज़ख़्म और थकावट की हालत में भी अल्लाह और उसके रसूल की बात मानना — यह कोई मामूली बात नहीं थी।
इन सहाबा की इबादत, वफ़ादारी और तक़वा की वजह से उन्हें बहुत बड़ा सवाब दिया गया। इससे मालूम होता है कि असली नेक़ी वो है जो तकलीफ़ और इम्तिहान में भी कायम रहे।
सच्चा ईमान वही है जो आसानियों में नहीं, बल्कि मुसीबतों में चमकता है, और यही अल्लाह की ख़ुशी का ज़रिया बनता है।
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