Transliteration: (Laa yattakhizil mu'minoonal kaafireena awliyaaa'a min doonil mu'mineena wa mai yaf'al zaalika falaisa minal laahi fee shai'in illaaa an tattaqoo minhum tuqaah; wa yuhazzirukumul laahu nafsah; wa ilal laahil maseer)
👉 यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब ख़ندق की लड़ाई के दौरान हज़रत उबादाह बिन समी़त (रज़ि.) ने पैगंबर ﷺ से कहा कि अगर हुक्म मिले तो 500 यहूदी साथ देंगे।
👉 अल्लाह ने साफ़ किया कि मुमिनों को काफ़िरों को अपनी दोस्ती में नहीं लेना चाहिए, खासतौर पर जब मुमिनों की जगह हो।
👉 दोस्ती का मतलब सिर्फ़ आम जान-पहचान नहीं, बल्कि दिल से वफ़ादारी और भरोसा है।
👉 अगर मुमिनों को मजबूरी में गैर-मुस्लिमों से संबंध बनाने पड़ें, तो भी उन्हें सतर्क रहना चाहिए।
👉 इसका मतलब यह नहीं कि वो दिल से दोस्त बनाएं, बल्कि जरूरत के वक्त बाहर से विनम्रता या डिप्लोमेसी हो सकती है।
👉 यह छुप-छुप कर झूठ बोलने या मज़हब छुपाने की नीयत नहीं है।
👉 असली मुमिनों को ऐसी जगह से हिजरत करनी चाहिए जहां उनका मज़हब दबाया जाता हो।
👉 ज़िंदगी की हिफ़ाज़त के लिए मजबूरी में कुछ बातें छुपाना ठीक है, लेकिन धोखा देना या मज़हब बदलना ग़लत है।
👉 अल्लाह यहाँ मुमिनों को सचेत करता है कि वे धोखे से बचें और सच्चाई को छुपाने या मज़हब को तोड़ने से डरें।
👉 झूठ और बग़लगी (मुनाफ़िक़ी) से बचना ज़रूरी है।
👉 अंत में, हर इंसान की वापसी अल्लाह के पास है — जहाँ उसकी पूरी हिसाब-किताब होगी।
नतीजा:
मुसलमानों को अपने दिल और दिल की दोस्ती में मुमिनों से जुड़ना चाहिए, और गैर-मुस्लिमों से संबंध केवल जरूरत और सतर्कता के साथ रखने चाहिए। धोखा और विश्वासघात से बचना परम अहमियत रखता है।
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