कुरान - 3:28 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
لَّا يَتَّخِذِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ٱلۡكَٰفِرِينَ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۖ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ فَلَيۡسَ مِنَ ٱللَّهِ فِي شَيۡءٍ إِلَّآ أَن تَتَّقُواْ مِنۡهُمۡ تُقَىٰةٗۗ وَيُحَذِّرُكُمُ ٱللَّهُ نَفۡسَهُۥۗ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلۡمَصِيرُ

Transliteration: (Laa yattakhizil mu'minoonal kaafireena awliyaaa'a min doonil mu'mineena wa mai yaf'al zaalika falaisa minal laahi fee shai'in illaaa an tattaqoo minhum tuqaah; wa yuhazzirukumul laahu nafsah; wa ilal laahil maseer)

28. "मुमिनों को चाहिए कि वे काफ़िरों को अपने दोस्तों (वाले) में न लें [62], बजाए मुमिनों के। और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई नाता नहीं, जब तक कि वह अपने आपको उनसे बचाए रखे [63]। और अल्लाह तुमसे डरने का इशारा करता है [64]। और अंत में वापसी अल्लाह ही के पास है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[62] "मुमिनों को काफ़िरों को दोस्त न बनाना" — दोस्ती और वफ़ादारी

👉 यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब ख़ندق की लड़ाई के दौरान हज़रत उबादाह बिन समी़त (रज़ि.) ने पैगंबर ﷺ से कहा कि अगर हुक्म मिले तो 500 यहूदी साथ देंगे।
👉 अल्लाह ने साफ़ किया कि मुमिनों को काफ़िरों को अपनी दोस्ती में नहीं लेना चाहिए, खासतौर पर जब मुमिनों की जगह हो।
👉 दोस्ती का मतलब सिर्फ़ आम जान-पहचान नहीं, बल्कि दिल से वफ़ादारी और भरोसा है।

[63] "अपने आप को उनसे बचाना" — सतर्क रहना ज़रूरी

👉 अगर मुमिनों को मजबूरी में गैर-मुस्लिमों से संबंध बनाने पड़ें, तो भी उन्हें सतर्क रहना चाहिए।
👉 इसका मतलब यह नहीं कि वो दिल से दोस्त बनाएं, बल्कि जरूरत के वक्त बाहर से विनम्रता या डिप्लोमेसी हो सकती है।
👉 यह छुप-छुप कर झूठ बोलने या मज़हब छुपाने की नीयत नहीं है।
👉 असली मुमिनों को ऐसी जगह से हिजरत करनी चाहिए जहां उनका मज़हब दबाया जाता हो।
👉 ज़िंदगी की हिफ़ाज़त के लिए मजबूरी में कुछ बातें छुपाना ठीक है, लेकिन धोखा देना या मज़हब बदलना ग़लत है।

[64] "अल्लाह से डरना" — ईमानदारी और सजगता का सबक़

👉 अल्लाह यहाँ मुमिनों को सचेत करता है कि वे धोखे से बचें और सच्चाई को छुपाने या मज़हब को तोड़ने से डरें।
👉 झूठ और बग़लगी (मुनाफ़िक़ी) से बचना ज़रूरी है।
👉 अंत में, हर इंसान की वापसी अल्लाह के पास है — जहाँ उसकी पूरी हिसाब-किताब होगी।

नतीजा:
मुसलमानों को अपने दिल और दिल की दोस्ती में मुमिनों से जुड़ना चाहिए, और गैर-मुस्लिमों से संबंध केवल जरूरत और सतर्कता के साथ रखने चाहिए। धोखा और विश्वासघात से बचना परम अहमियत रखता है।

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