Transliteration: (Wa iz qaalatil malaaa'ikatu yaa Maryamu innal laahas tafaaki wa tahharaki wastafaaki 'alaa nisaaa'il 'aalameen)
सैय्यदा मरयम (रज़ियल्लाहु अन्हा) अपने ज़माने की सबसे इज़्ज़तदार और पाक औरत थीं। उन्हें अल्लाह ने उनकी इबादत, परहेज़गारी और पवित्रता की वजह से चुना। वह मस्जिद-अल-अक़सा की देखभाल करने वाली थीं, जो आमतौर पर मर्दों का काम था। वह गुनाहों से पाक और इबादत में लीन रहती थीं।
हालाँकि, उम्मत-ए-मुहम्मद ﷺ में सैय्यदा फ़ातिमा (रज़ि.) और उम्महातुल मो’मिनीन (नबी ﷺ की पत्नियाँ) को सबसे बड़ा मुक़ाम हासिल है, जैसा कि कुरआन में आया: “ऐ नबी की बीवियों! तुम आम औरतों जैसी नहीं हो।” (सूरह अल-अहज़ाब, 33:32)
फ़रिश्तों का मरयम से यह कहना वही (ईश्वरीय संदेश) नहीं था, क्योंकि किसी औरत को नबूवत नहीं दी गई।
मरयम (रज़ियल्लाहु अन्हा) को कई ख़ास नेमतों से नवाज़ा गया:
इन नेमतों की वजह से मरयम (रज़ि.) को अपने दौर की तमाम औरतों से ऊँचा मुक़ाम मिला, और वे हर दौर में मशहूर और आदरणीय बनी रहीं।
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