कुरान - 3:44 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
ذَٰلِكَ مِنۡ أَنۢبَآءِ ٱلۡغَيۡبِ نُوحِيهِ إِلَيۡكَۚ وَمَا كُنتَ لَدَيۡهِمۡ إِذۡ يُلۡقُونَ أَقۡلَٰمَهُمۡ أَيُّهُمۡ يَكۡفُلُ مَرۡيَمَ وَمَا كُنتَ لَدَيۡهِمۡ إِذۡ يَخۡتَصِمُونَ

Transliteration: (Zaalika min ambaaa'il ghaibi nooheehi ilaik; wa maa kunta ladaihim iz yulqoona aqlaamahum ayyuhum yakfulu Maryama wa maa kunta ladaihim iz yakhtasimoon)

यह ग़ैब की ख़बरें हैं, जिन्हें हम तुम्हें (वही के ज़रिये) सुना रहे हैं। और तुम उनके पास नहीं थे, जब वे मरयम की देखभाल के लिए अपने तीर डाल रहे थे, और न ही तुम उनके पास थे जब वे आपस में झगड़ रहे थे [96] [97]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह आले-इमरान – आयत 44 की तफ़्सीर

 

✅ [96] नबी की नबूवत का सबूत – ग़ैब की ख़बरें

अल्लाह तआला रसूलुल्लाह ﷺ को याद दिला रहा है कि वे इन घटनाओं के समय मौजूद नहीं थे, फिर भी वही की मदद से इनका तफ़्सील से बयान कर रहे हैं।
यह नबूवत का खुला सबूत है, क्योंकि इस तरह का इल्म सिर्फ इल्हामी ज़रिये से ही मुमकिन है।
जैसा कि फ़रमाया: “ऐ प्यारे! हमने तुम्हें गवाह बना कर भेजा...” (सूरह अल-अहज़ाब, 33:45)
और: “क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे रब ने हाथी वालों के साथ क्या किया?” (सूरह अल-फील, 105:1)
इस आयत से साबित होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ को इल्म-ए-ग़ैब अता किया गया है, और वे नबूवत के नूर से गुज़रे और आने वाले वाक़िआत से आगाह हैं।

✅ [97] मरयम की देखभाल पर झगड़ा

मस्जिद-अल-अक़सा के सारे खादिम यह चाहते थे कि उन्हें सैय्यदा मरयम (रज़ि.) की परवरिश का शर्फ़ मिले, क्योंकि वह उनके पेशवा हज़रत इमरान (अलैहिस्सलाम) की बेटी थीं।
इस फ़ैसले के लिए उन्होंने अपने क़लमों के ज़रिये क़ुरआ डाला—जिसका क़लम पानी में डूबे नहीं, वही मरयम की देखभाल करेगा।
इससे दो बातें साबित होती हैं:

  • क़ुरआ डालना (मत डालना या लॉटरी करना) एक जायज़ और हिकमत भरा तरीका है फ़ैसले का।
  • नेक लोगों की औलाद की इज़्ज़त करना और उनकी सेवा करना इस्लाम में एक पसंदीदा अमल है।

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