कुरान - 3:55 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
إِذۡ قَالَ ٱللَّهُ يَٰعِيسَىٰٓ إِنِّي مُتَوَفِّيكَ وَرَافِعُكَ إِلَيَّ وَمُطَهِّرُكَ مِنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَجَاعِلُ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوكَ فَوۡقَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَٰمَةِۖ ثُمَّ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأَحۡكُمُ بَيۡنَكُمۡ فِيمَا كُنتُمۡ فِيهِ تَخۡتَلِفُونَ

Transliteration: (Iz qaalal laahu yaa 'Eesaaa innee mutawaffeeka wa raafi'uka ilaiya wa mutah hiruka minal lazeena kafaroo wa jaa'ilul lazeenattaba ooka fawqal lazeena kafarooo ilaa Yawmil Qiyaamati summa ilaiya marji'ukum fa ahkumu bainakum feemaa kuntum feehi takhtaliifoon)

“और (वह वक्त याद करो) जब अल्लाह ने कहा: ऐ ईसा, मैं तुझे पूरी उम्र तक पहुँचाऊँगा [118], और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा [119], और तुझे इनकार करने वालों से पाक कर दूँगा [120], और तेरे मानने वालों को क़ियामत के दिन तक इनकार करने वालों पर ग़ालिब कर दूँगा [121][122]। फिर तुम सब मेरी ही ओर लौटाए जाओगे, और मैं तुम्हारे आपसी झगड़ों में फ़ैसला कर दूँगा।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह आले-इमरान – आयत 55 की तफ़्सीर

 

✅ [118] क्रम की प्राथमिकता नहीं होती

अरबी भाषा में “वाव” (और) का इस्तेमाल क्रम के अनुसार ज़रूरी नहीं होता। यहाँ पहले मौत का ज़िक्र है, फिर उठाए जाने का, जबकि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को पहले ही जिंदा आसमानों की ओर उठा लिया गया था।

✅ [119] अल्लाह की ओर उठाना — जिस्मानी उरूज

“मैं तुझे अपनी ओर उठा लूँगा” का मतलब है कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को जिंदा और जिस्मानी तौर पर आसमानों की तरफ़ उठा लिया गया, जहाँ वह फ़रिश्तों के साथ ज़िंदा मौजूद हैं।

  • वह क़ियामत से पहले ज़मीन पर वापस आएँगे,
  • शादी करेंगे,
  • चालीस साल ज़िंदगी गुज़ारेंगे,
  • फिर वफ़ात पाएँगे और हज़रत मुहम्मद ﷺ के रोज़ा मुबारक में दफ़न होंगे।

✅ [120] इनकार करने वालों से पाक करना

“तुझे इनकार करने वालों से पाक कर दूँगा” यानी अल्लाह ने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को उन यहूदियों से पूरी तरह बचा लिया,

  • जो उन्हें क़त्ल करना चाहते थे,
  • उनका मक्र (साज़िश) नाकाम हो गया।

✅ [121] “तेरे मानने वाले” कौन हैं?

इससे मुराद या तो:

  • हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के असली मानने वाले — उनके दौर के हवारियून (शागिर्द),
  • या फिर मुसलमान, जो उन्हें अल्लाह का नबी मानते हैं और क़ुरआन पर ईमान रखते हैं — जो उनकी नबूवत की तस्दीक करता है।
    इसलिए, हर सच्चा मुसलमान भी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का मानने वाला है।

✅ [122] इनकार करने वालों पर ग़ालिब रहना

यहूद या दूसरे इनकार करने वाले,

  • जिन पर ईसा (अलैहिस्सलाम) के मानने वालों को दीन, हक़, हुज्जत और हुकूमत के लिहाज़ से ग़लिबी दी गई है।
  • और यह क़ियामत तक जारी रहेगी।
  • आख़िरत में, सच्चे ईमान वालों को हमेशा की कामयाबी और बलंदी अता की जाएगी।

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