कुरान - 3:57 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

57
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ فَيُوَفِّيهِمۡ أُجُورَهُمۡۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Wa ammal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati fa yuwaffeehim ujoorahum; wallaahu laa yuhibbuz zaalimeen)

“रहे वो लोग जो ईमान लाए और नेक अमल किए [125], तो अल्लाह उन्हें उनके इनाम पूरी तरह अता फरमाएगा [126], और अल्लाह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 57 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह आले-इमरान – आयत 57 की तफ़्सीर

 

✅ [125] सिर्फ़ ईमान काफ़ी नहीं — नेक अमल भी ज़रूरी

यह आयत बताती है कि सिर्फ़ ईमान लाना ही काफ़ी नहीं, बल्कि उसके साथ नेक अमल करना भी अनिवार्य है।

  • हर मोमिन को अपने हालात और ताक़त के मुताबिक़ अच्छे काम करने चाहिए।
  • बग़ैर अमल के ईमान अधूरा रह जाता है।

✅ [126] पूरा इनाम और अल्लाह का फ़ज़्ल

अल्लाह तआला ईमान वालों को:

  • हर नेकी का पूरा बदला देगा,
  • कुछ को दोहरा इनाम,
  • और कुछ को बेहिसाब रहमतें भी अता करेगा।

इस आयत में यह भी साबित होता है कि अल्लाह के इनाम मुकम्मल और इंसाफ़ पर आधारित होते हैं, और जो ज़ुल्म करते हैं, उन्हें अल्लाह बिल्कुल पसंद नहीं करता।

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