कुरान - 3:66 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

66
هَـٰٓأَنتُمۡ هَـٰٓؤُلَآءِ حَٰجَجۡتُمۡ فِيمَا لَكُم بِهِۦ عِلۡمٞ فَلِمَ تُحَآجُّونَ فِيمَا لَيۡسَ لَكُم بِهِۦ عِلۡمٞۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Haaa antum haaa'ulaaa'i haajajtum feemaa lakum bihee 'ilmun falima tuhaaajjoonaa feemaa laisa lakum bihee 'ilm; wallaahu ya'lamu wa antum laa ta'lamoon)

देखो! तुम वही लोग हो जो उन मामलों में तो झगड़ चुके हो जिनका तुम्हें ज्ञान था [143], तो अब उन बातों में क्यों झगड़ते हो जिनका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं? और अल्लाह जानता है, जबकि तुम नहीं जानते। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 66 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 66 की तफ़्सीर

 

✅ [143] ज्ञान होते हुए भी सच्चाई को नकारना

यह आयत उन अहले किताब की आलोचना करती है जो:

  • पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के आने की खबर रखते थे,
  • उनकी निशानियों, अख़्लाक़ और नबूवत की पहचान जानते थे,
    फिर भी जिद और हठधर्मी के कारण उन्हें झुठलाते थे।

ऐसे लोग सच्चाई से वाक़िफ़ होकर भी झगड़ते हैं, जो कि एक जान-बूझकर बग़ावत है — न कि कोई सामान्य ग़लतफ़हमी।

⚠️ महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण:
अगर कोई व्यक्ति नबी के निजी राय (जो वह वह्य के बिना व्यक्त करें) से सम्मानपूर्वक असहमति जताए, तो वह कुफ़्र नहीं कहलाता।
जैसे कि:
"निःसंदेह, एक समूह मुसलमानों का नाराज़ हुआ। वे बहस कर रहे थे..." (सूरह अल-अन्फाल: 5)
यहां बहस करने वाले फिर भी मोमिन माने गए।

इसलिए:

  • नबी की वह्य (ईश्वरीय संदेश) का इनकार = कुफ़्र
  • ग़ैर-ईश्वरीय मामलों में आदर सहित असहमति = गुनाह नहीं, कुफ़्र नहीं

यह आयत यह भी याद दिलाती है कि अल्लाह का ज्ञान पूर्ण है, जबकि इंसान की समझ सीमित — इसलिए जब सच्चाई स्पष्ट हो जाए, तो उसे दिल से स्वीकार करना ही ईमान की मांग है।

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