Transliteration: (Haaa antum haaa'ulaaa'i haajajtum feemaa lakum bihee 'ilmun falima tuhaaajjoonaa feemaa laisa lakum bihee 'ilm; wallaahu ya'lamu wa antum laa ta'lamoon)
यह आयत उन अहले किताब की आलोचना करती है जो:
ऐसे लोग सच्चाई से वाक़िफ़ होकर भी झगड़ते हैं, जो कि एक जान-बूझकर बग़ावत है — न कि कोई सामान्य ग़लतफ़हमी।
⚠️ महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण:
अगर कोई व्यक्ति नबी के निजी राय (जो वह वह्य के बिना व्यक्त करें) से सम्मानपूर्वक असहमति जताए, तो वह कुफ़्र नहीं कहलाता।
जैसे कि:
"निःसंदेह, एक समूह मुसलमानों का नाराज़ हुआ। वे बहस कर रहे थे..." (सूरह अल-अन्फाल: 5)
यहां बहस करने वाले फिर भी मोमिन माने गए।
इसलिए:
यह आयत यह भी याद दिलाती है कि अल्लाह का ज्ञान पूर्ण है, जबकि इंसान की समझ सीमित — इसलिए जब सच्चाई स्पष्ट हो जाए, तो उसे दिल से स्वीकार करना ही ईमान की मांग है।
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