कुरान - 3:68 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

68
إِنَّ أَوۡلَى ٱلنَّاسِ بِإِبۡرَٰهِيمَ لَلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا ٱلنَّبِيُّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۗ وَٱللَّهُ وَلِيُّ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Innaa awlan naasi bi Ibraaheema lallazeenat taba 'oohu wa haazan nabiyyu wallazeena aamanoo; wallaahu waliyyul mu'mineen)

निःसंदेह, इब्राहीम (अलैहि सलाम) से सबसे अधिक निकट वही लोग हैं जिन्होंने उनकी पैरवी की [145], और यह नबी (मुहम्मद ﷺ) और वे लोग जो ईमान लाए। और अल्लाह मोमिनों का संरक्षक है [146]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 68 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 68 की तफ़्सीर

 

✅ [145] हज़रत इब्राहीम (अलैहि सलाम) के सच्चे अनुयायी

यह आयत स्पष्ट करती है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहि सलाम) के असली वारिस वे हैं जो उनकी शिक्षा, उनके तौहीद के रास्ते और उनकी नीयत की सच्चाई पर चलने वाले हैं। इसमें सबसे पहले आते हैं वे लोग जो इस्लाम से पहले ईमानदार अनुयायी थे, और फिर हज़रत मुहम्मद ﷺ और उनकी उम्मत, जो हज़रत इब्राहीम (अलैहि सलाम) की अकीदा और अमली सुन्नतों को आगे बढ़ाते हैं।

इससे यह सीख मिलती है कि नज़दीकी का आधार नस्ल या वंश नहीं, बल्कि आज्ञापालन है। अगर कोई पैग़म्बर के घराने से हो लेकिन ईमान न लाए — जैसे हज़रत नूह (अलैहि सलाम) के बेटे कनआन — तो वह नेक बंदों में शुमार नहीं होता। इसलिए, जो यहूद और नसारा हज़रत इब्राहीम की असल तौहीद से भटक चुके हैं, वे उनके वारिस नहीं माने जा सकते।

इस्लाम ने हज़रत इब्राहीम (अलैहि सलाम) की असल सुन्नतों को ज़िंदा किया — जैसे कि हज, क़ुर्बानी, खतना, और दाढ़ी रखना — जो ईसाई या यहूदी धर्मों में अब प्रचलन में नहीं रहे। अतः सिर्फ मुसलमान ही सच्चे अर्थों में उनके अनुयायी कहला सकते हैं।

✅ [146] अल्लाह मोमिनों का संरक्षक है

यहां से दो अहम बातें निकलती हैं: पहली यह कि अल्लाह की रहमत अक्सर नेक बंदों के वसीले से दूसरों पर भी उतरती है, यानी अगर कोई ईमानवाला नेक लोगों से जुड़ा हो, तो उसकी हिफ़ाज़त अल्लाह करता है। दूसरी बात यह कि मोमिन कभी पूरी तरह छोड़ा नहीं जाता — अगर कोई मुसलमान गुनाह करे भी, लेकिन उसका पैग़म्बर ﷺ से जुड़ाव और अल्लाह पर ईमान बाकी हो, तो अल्लाह उसकी निगरानी करता है। "अल्लाह मोमिनों का वली है", यानी संरक्षक और सहायक — और यह सुरक्षा सिर्फ़ पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ से दिली वफादारी की वजह से मिलती है।

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