Transliteration: (Yaaa Ahlal Kitaabi lima takfuroona bi Aayaatil laahi wa antum tash hadoon)
इस आयत से यह बात बिल्कुल साफ़ होती है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ को न मानना, दरअसल अल्लाह की तमाम निशानियों को न मानने के बराबर है। क्योंकि रसूल ﷺ अल्लाह की निशानियों का आख़िरी और मुकम्मल ज़ाहिर हैं, इसलिए उनकी तस्दीक़ करना, सारी दैवी निशानियों को स्वीकारना है।
किताब वाले — यानी यहूद और नसारा — अपनी किताबों में दर्ज बशारतों और अलामात के बावजूद, जब नबी ﷺ को पहचान कर भी इनकार करते हैं, तो यह सीधे तौर पर अल्लाह की हिदायत और रहमत का इनकार माना जाता है। वे गवाह होने के बावजूद सच को झुठला रहे हैं, और इसी को अल्लाह ने सबसे बड़ा ज़ुल्म कहा।
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