Transliteration: (Yaaa Ahalal Kitaabi lima talbisoonal haqqa bilbaatili wa taktumoonal haqqa wa antum ta'lamoon)
इस आयत में "हक़" से मुराद है तौरेत और इंजील में अल्लाह की ओर से नाज़िल हुई असली, बिना बदली हुई बातें, और "बातिल" से मुराद है वो मिलावट, तहरीफ़ और इंसानी राय जो बाद में उनमें शामिल कर दी गईं। ख़ासतौर से यहूदी आलिमों ने अपने स्वार्थ के लिए अल्लाह की किताब में इंसानी फ़तवे और बदलाव डाल दिए — जिससे लोग सच्चे दीन से भटक गए।
क़ुरआन साफ़ करता है कि सच और झूठ को मिलाना, लोगों को गुमराह करने की चालाकी है। इसके उलट, क़ुरआन के मुफ़स्सिरीन हद दर्जे की एहतियात बरतते हैं — वे कभी भी इंसानी तफ़्सीर को क़ुरआन की आयत जैसा दिखाते नहीं, बल्कि उसे अलग से पेश करते हैं (जैसे: bold सुरा नाम, रुक़ू निशान)।
इस भाग से दो बड़ी सीखें मिलती हैं:
इल्म के बावजूद सच को छुपाना, अल्लाह की नज़रों में सबसे बड़ा ज़ुल्म है।
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