कुरान - 3:71 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

71
يَـٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تَلۡبِسُونَ ٱلۡحَقَّ بِٱلۡبَٰطِلِ وَتَكۡتُمُونَ ٱلۡحَقَّ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Yaaa Ahalal Kitaabi lima talbisoonal haqqa bilbaatili wa taktumoonal haqqa wa antum ta'lamoon)

ऐ किताब वालों! तुम हक़ को बातिल के साथ मिलाकर क्यों पेश करते हो [150], और सच को छिपाते क्यों हो जबकि तुम्हें मालूम है? [151] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 71 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 71 की तफ़्सीर

 

✅ [150] हक़ को बातिल के साथ मिलाना

इस आयत में "हक़" से मुराद है तौरेत और इंजील में अल्लाह की ओर से नाज़िल हुई असली, बिना बदली हुई बातें, और "बातिल" से मुराद है वो मिलावट, तहरीफ़ और इंसानी राय जो बाद में उनमें शामिल कर दी गईं। ख़ासतौर से यहूदी आलिमों ने अपने स्वार्थ के लिए अल्लाह की किताब में इंसानी फ़तवे और बदलाव डाल दिए — जिससे लोग सच्चे दीन से भटक गए।

क़ुरआन साफ़ करता है कि सच और झूठ को मिलाना, लोगों को गुमराह करने की चालाकी है। इसके उलट, क़ुरआन के मुफ़स्सिरीन हद दर्जे की एहतियात बरतते हैं — वे कभी भी इंसानी तफ़्सीर को क़ुरआन की आयत जैसा दिखाते नहीं, बल्कि उसे अलग से पेश करते हैं (जैसे: bold सुरा नाम, रुक़ू निशान)।

✅ [151] सच को जानकर भी छुपाना

इस भाग से दो बड़ी सीखें मिलती हैं:

  1. कभी भी इंसानी बातों को क़ुरआन के बराबर नहीं ठहराया जा सकता, और न ही इस अंदाज़ में पेश किया जा सकता है जिससे दिव्य और इंसानी बातें आपस में गडमड हो जाएं।
  2. जो लोग जानबूझकर सच्चाई को छुपाते हैं, ख़ासतौर से ईमान और आख़िरी रसूल ﷺ से जुड़ी सच्चाइयों को, वे सिर्फ़ बड़ा गुनाह नहीं कर रहे बल्कि लोगों को भी दीन से दूर कर रहे हैं। इसमें शामिल हैं — पैग़म्बर की बशारतें छुपाना, असली शिक्षाओं को बदलना, या राजनीतिक मकसद से दीन में तहरीफ़ करना।

इल्म के बावजूद सच को छुपाना, अल्लाह की नज़रों में सबसे बड़ा ज़ुल्म है।

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