Transliteration: (Wa qaalat taaa'ifatum min Ahlil Kitaabi aaminoo billazeee unzila 'alal lazeena aamanoo wajhan nahaari wakfurooo aakhirahoo la'alla hum yarji'oon)
यह आयत बारह यहूदी पंडितों की एक चाल को उजागर करती है, जो ख़ैबर के रहने वाले थे। उन्होंने यह साज़िश रची कि कुछ यहूदी सुबह-सुबह इस्लाम कबूल कर लें और फिर शाम होते-होते उसे छोड़ दें, और लोगों से कहें: "इस्लाम या नबी ﷺ में कोई बड़ाई नहीं मिली।" वे ये जताना चाहते थे कि सच्चा पैग़म्बर तो वही होता है जिसकी निशानियाँ हमारी किताबों में साफ़ तौर पर दर्ज हों।
क़ुरआन ने इस चाल को फौरन बेनक़ाब कर दिया और इसे नाकाम बना दिया।
1. इस्लाम के दुश्मन मक्कारी से साज़िशें रचते हैं:
कुफ़्फ़ार और दीन के दुश्मन ऐसी मक्कारियाँ सोचते हैं जो शायद शैतान भी न सोच सके — जैसे दिखावे का ईमान लाकर दूसरों के ईमान को डगमगाने की कोशिश।
2. मुरतद (ईमान छोड़ने वाले) की सज़ा और उसका ख़तरा:
इस्लाम में मुरतद्दीन (जो इस्लाम छोड़ते हैं) को सख्त सज़ा दी जाती है, क्योंकि यह खुदा के हुक्म की बग़ावत होती है। जैसा कि हज़रत मूसा (अलैहि सलाम) के ज़माने में भी बछड़े की पूजा करने वालों को हुक्म दिया गया:
“अपने आप में से कुछ को क़त्ल करो” (सूरह 2:54) — यानी बग़ावत का अंजाम हमेशा गंभीर होता है।
इस आयत से साफ़ होता है कि धोखेबाज़ी से ईमान की बुनियादों को हिलाने की कोशिश, अल्लाह और उसके दीन से सीधा टकराव है — और इसका अंजाम दोनों दुनिया में हाज़िर और सख्त होता है।
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