Transliteration: (Wa min Ahlil Kitaabi man in ta'manhu biqintaariny yu'addihee ilaika wa minhum man in ta'manhu bi deenaarin laa yu'addiheee ilaika illaa maa dumta 'alaihi qaaa' imaa; zaalika biannahum qaaloo laisa 'alainaa fil ummiyyeena sabeelunw wa yaqooloona 'alal laahil kaziba wa hum ya'lamoon)
इस आयत के नाज़िल होने का सबब यह था कि हज़रत अब्दुल्लाह इब्न सलाम (रज़ि.) और फाख़ास इब्न आज़ुरा, दोनों यहूदी थे।
👉 एक क़ुरैशी व्यक्ति ने 1200 अशर्फ़ियाँ अब्दुल्लाह इब्न सलाम (रज़ि.) को बिना किसी गवाह के अमानत रखीं, और उन्होंने वो ईमानदारी से वापस लौटा दीं।
👉 वहीं एक दीनार फाख़ास को दिया गया, लेकिन उसने लौटाने से इनकार कर दिया।
सीख:
यह वाक्य दर्शाता है कि कुछ लोग पैसे तभी लौटाते हैं जब बार-बार तगादा किया जाए या लोगों के सामने शर्मिंदा किया जाए।
👉 यह कोई अच्छाई नहीं, क्योंकि यह डर या दबाव से हुआ अमल है, न कि दिली ईमानदारी से।
यहां से यह स्पष्ट होता है कि:
यहूद यह दावा करते थे कि “हमें ग़ैर-यहूदियों के माल में कोई हिसाब नहीं”, और इस झूठ को अल्लाह की तरफ़ मंसूब करते थे।
👉 यह एक खुला झूठ और अल्लाह की नाफ़रमानी है, और इस आयत में अल्लाह ने इस सख़्ती से नकारा है।
👉 दीन को अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़ कर पेश करना, और अल्लाह पर झूठ बाँधना, सबसे ख़तरनाक जुर्मों में से है।
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