कुरान - 3:75 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

75
۞وَمِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ مَنۡ إِن تَأۡمَنۡهُ بِقِنطَارٖ يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيۡكَ وَمِنۡهُم مَّنۡ إِن تَأۡمَنۡهُ بِدِينَارٖ لَّا يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيۡكَ إِلَّا مَا دُمۡتَ عَلَيۡهِ قَآئِمٗاۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَالُواْ لَيۡسَ عَلَيۡنَا فِي ٱلۡأُمِّيِّـۧنَ سَبِيلٞ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa min Ahlil Kitaabi man in ta'manhu biqintaariny yu'addihee ilaika wa minhum man in ta'manhu bi deenaarin laa yu'addiheee ilaika illaa maa dumta 'alaihi qaaa' imaa; zaalika biannahum qaaloo laisa 'alainaa fil ummiyyeena sabeelunw wa yaqooloona 'alal laahil kaziba wa hum ya'lamoon)

और अहले किताब में कुछ लोग ऐसे भी हैं कि अगर तुम उन्हें बहुत सा माल अमानत रखवाओ, तो वे तुम्हें लौटा देंगे [157]; और उनमें कुछ ऐसे भी हैं कि अगर एक दीनार भी रखवाओ, तो वह भी न लौटाएँगे जब तक कि तुम उनके ऊपर खड़े न रहो [158]। यह इसलिए है कि वे कहते हैं: "हम पर उम्मियों (ग़ैर-यहूदियों) के बारे में कोई हिसाब नहीं है।" और वे जान-बूझकर अल्लाह पर झूठ बाँधते हैं [160]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 75 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 75 की तफ़्सीर

 

✅ [157] ईमानदारी और अमानतदारी — किसी एक क़ौम की बपौती नहीं

इस आयत के नाज़िल होने का सबब यह था कि हज़रत अब्दुल्लाह इब्न सलाम (रज़ि.) और फाख़ास इब्न आज़ुरा, दोनों यहूदी थे।

👉 एक क़ुरैशी व्यक्ति ने 1200 अशर्फ़ियाँ अब्दुल्लाह इब्न सलाम (रज़ि.) को बिना किसी गवाह के अमानत रखीं, और उन्होंने वो ईमानदारी से वापस लौटा दीं।
👉 वहीं एक दीनार फाख़ास को दिया गया, लेकिन उसने लौटाने से इनकार कर दिया।

सीख:

  • अमानतदारी एक महान सिफ़त है, चाहे वह किसी भी धर्म या क़ौम के व्यक्ति में हो।
  • धोखाधड़ी और बेईमानी हर हाल में निंदनीय है।

✅ [158] "उसके ऊपर खड़ा रहना" — दबाव से वापसी, ईमानदारी नहीं

यह वाक्य दर्शाता है कि कुछ लोग पैसे तभी लौटाते हैं जब बार-बार तगादा किया जाए या लोगों के सामने शर्मिंदा किया जाए।
👉 यह कोई अच्छाई नहीं, क्योंकि यह डर या दबाव से हुआ अमल है, न कि दिली ईमानदारी से।

✅ [159] अमानत और हिसाब — मुसलमान और ग़ैर-मुसलमान सभी के लिए

यहां से यह स्पष्ट होता है कि:

  • ग़ैर-मुस्लिम की अमानत को छुपाना, हड़पना या धोखा देना इस्लाम में हराम है।
  • हज़रत अली (रज़ि.) को भी हिजरत के वक्त अल्लाह के रसूल ﷺ ने मक्का में अमानतें वापस करने के लिए छोड़ा, जबकि वही लोग उनके क़त्ल के इरादे से थे — यह इस्लामी ईमानदारी का बेहतरीन नमूना है।

✅ [160] अल्लाह पर झूठी बात बाँधना — सबसे बड़ा जुर्म

यहूद यह दावा करते थे कि “हमें ग़ैर-यहूदियों के माल में कोई हिसाब नहीं”, और इस झूठ को अल्लाह की तरफ़ मंसूब करते थे।

👉 यह एक खुला झूठ और अल्लाह की नाफ़रमानी है, और इस आयत में अल्लाह ने इस सख़्ती से नकारा है।
👉 दीन को अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़ कर पेश करना, और अल्लाह पर झूठ बाँधना, सबसे ख़तरनाक जुर्मों में से है।

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