कुरान - 3:92 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

92
لَن تَنَالُواْ ٱلۡبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُواْ مِمَّا تُحِبُّونَۚ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَيۡءٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٞ

Transliteration: (Lan tanaalul birra hattaa tunfiqoo mimmaa tuhibboon; wa maa tunfiqoo min shai'in fa innal laaha bihee 'Aleem)

तुम कभी भी नेक़ी (सच्ची भलाई) को नहीं पा सकते [203], जब तक कि तुम वह चीज़ें खर्च न करो जिन्हें तुम पसंद करते हो [204]। और जो कुछ भी तुम खर्च करते हो, अल्लाह उसे जानता है [205]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 92 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 92 की तफ़्सीर

✅ [203] "नेक़ी को पाना" का मतलब

यहाँ नेक़ी से मुराद है तक़्वा, अल्लाह की फ़रमाबरदारी और आख़िरत में जन्नत। इसे पाना सिर्फ़ बातों से नहीं, बल्कि कुर्बानी और अमल से होता है।

✅ [204] अल्लाह की राह में खर्च करने के उसूल

इस आयत से कई बातें मालूम होती हैं:

  • इंसान को अपनी सारी दौलत नहीं, बल्कि उसका कुछ हिस्सा खर्च करना चाहिए
  • हर तरह की माल से खर्च किया जाए, सिर्फ़ बेकार चीज़ें न दी जाएं
  • फ़र्ज़ सदक़ा (ज़कात) के साथ-साथ नफ़ली इनफ़ाक़ (स्वेच्छा से देना) भी शामिल है
  • जो चीज़ तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यारी हो, उसी को देना सच्ची भलाई है
    उदाहरण: हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ चीनी को सदक़ा में देते थे क्योंकि वह उन्हें पसंद थी, और जब पूछा गया, तो उन्होंने इसी आयत की तिलावत की

✅ [205] अल्लाह हर खर्च को जानता है

चाहे खर्च छुपकर हो या खुले आम, और नियत अच्छी हो या बुरी — अल्लाह सब जानता है। इसलिए इख़लास (सच्ची नियत) से ही खर्च करना चाहिए, ख़ासकर जब अपनी प्यारी चीज़ दी जाए।

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