Transliteration: (Qaaloo yaa Moosaaa innaa lan nadkhulahaa abadam maa daamoo feehaa fazhab anta wa Rabbuka faqaatilaaa innaa haahunaa qaa'idoon)
इस आयत से वर्तमान के कुछ वहाबी यह दलील लेते हैं कि
अगर औलिया के पास ताक़त होती, तो सेना भेजने की क्या ज़रूरत थी?
वो कहते हैं कि सिर्फ औलिया को भेज दो, वही सब कर देंगे।
यह सोच इस आयत की ग़लत तफ़्सीर है,
क्योंकि इसमें अल्लाह पर तवक्कुल के साथ-साथ
अमली कोशिश की अहमियत को नज़रअंदाज़ किया जाता है।
औलिया का वुजूद अल्लाह की मर्जी से होता है,
मगर ज़मीन पर अमल करना इंसान की ज़िम्मेदारी है।
इस आयत से यह साबित होता है कि
हज़रत मूसा عليه السلام के साथियों की कमज़ोरी और बेवफ़ाई,
हज़रत मुहम्मद ﷺ के सहाबा की वफ़ादारी के मुक़ाबले में बेहद कमतर थी।
बनी इस्राईल ने लड़ाई से इंकार कर दिया,
यह कहकर कि "तुम और तुम्हारा रब जाओ, हम तो बैठे रहेंगे"।
जबकि हज़रत मुहम्मद ﷺ के सहाबा ने
कठिन से कठिन हालात में भी उनका साथ नहीं छोड़ा।
उन्होंने जान, माल और सब कुछ कुरबान कर दिया,
मगर रसूल ﷺ से बेवफ़ाई नहीं की।
जैसे रसूलुल्लाह ﷺ तमाम अंबिया में अफज़ल हैं,
वैसे ही उनके सहाबा भी तमाम उम्मतों के सहाबा से अफज़ल हैं।
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