कुरान - 5:39 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
فَمَن تَابَ مِنۢ بَعۡدِ ظُلۡمِهِۦ وَأَصۡلَحَ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَتُوبُ عَلَيۡهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ

Transliteration: (Faman taaba mim ba'di zulmihee wa aslaha fa innal laaha yatoobu 'alaih; innal laaha Ghafoorur Raheem)

फिर जो अपने गुनाह के बाद तौबा करे और इस्लाह कर ले, तो अल्लाह उसकी तौबा क़ुबूल कर लेता है। बेशक अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, रहमत वाला है [125]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 39 की तफ़्सीर

 

✅ [125] सज़ा के बाद भी तौबा की राह खुली है

"जो तौबा करे" — यह लफ़्ज़ बताता है कि अगर चोर को सज़ा (जैसे हाथ काटना) दी भी जा चुकी हो, तब भी उसके लिए तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं होता। सच्ची तौबा का मतलब है कि चोर अपने गुनाह को माने, दिल से पश्चाताप करे, और आगे के लिए अपने अमल की इस्लाह करे यानी चोरी और गुनाह से बिल्कुल तौबा कर ले।
अल्लाह की रहमत इस बात पर ज़ोर देती है कि चाहे गुनाह कितना ही बड़ा क्यों न हो, अगर बंदा दिल से सुधर जाए, तो अल्लाह उसे माफ़ करने वाला और रहमत वाला है।

✅ सज़ा के लागू होने की शर्तें

हाथ काटने की सज़ा तभी लागू होती है जब चोरी की गई चीज़ की क़ीमत एक निश्चित हद तक पहुँचे। यह दो सवा तीन रुपये, या उस दौर के मुताबिक़ दस दिरहम के बराबर मानी गई थी।
फैसला इस्लामी अदालत या हाकिम के सामने किया जाता है। चोरी को साबित करने के लिए या तो चोर का इक़रार (स्वीकार) ज़रूरी है या दो भरोसेमंद गवाहों की गवाही।
अगर मामला अदालत तक पेश होने से पहले हल हो जाए, तो यह इंसानी हक़ का मामला रहता है और मालिक माफ़ कर सकता है। लेकिन जब मामला अदालत में चला जाए, तो यह हुदूद (अल्लाह के हुक्मों) में शामिल हो जाता है और फिर माफ़ी की गुंजाइश नहीं रहती — क्यूँकि यह फिर अल्लाह के क़ानून की खिलाफ़वर्जी बन जाती है।

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