कुरान - 5:37 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
يُرِيدُونَ أَن يَخۡرُجُواْ مِنَ ٱلنَّارِ وَمَا هُم بِخَٰرِجِينَ مِنۡهَاۖ وَلَهُمۡ عَذَابٞ مُّقِيمٞ

Transliteration: (Yureedoona ai yakhrujoo minan Naari wa maa hum bikhaari jeena minhaa wa lahum 'azaabum muqeem)

वे चाहेंगे कि आग से निकल जाएं, लेकिन वे उसमें से कभी नहीं निकल पाएंगे। उनके लिए हमेशा रहने वाला अज़ाब है [121]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 37 की तफ़्सीर

 

✅ [121] काफ़िरों के लिए हमेशा का अज़ाब

इस आयत में जहन्नम के अज़ाब की हमेशा रहने वाली सज़ा का ज़िक्र है, जो उन लोगों के लिए मुक़र्रर की गई है जिन्होंने ईमान को ठुकराया। काफ़िर बार-बार यह ख्वाहिश करेंगे कि किसी तरह इस अज़ाब से निकल जाएं, लेकिन उन्हें कोई राहत या निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा। जहन्नम का अज़ाब न कभी कम होगा, न ही उसका दौर खत्म होगा — यह लगातार और शदीद रहेगा।

यह सज़ा सिर्फ काफ़िरों के लिए है। इसके बरअक्स, मोमिन अगर किसी वजह से सज़ा पाएंगे, तो वह हमेशा की नहीं होगी, और उनकी सज़ा हल्की या अस्थाई हो सकती है। कुछ रिवायतों के मुताबिक, अज़ाब के दौरान रुह को जिस्म से अलग कर दिया जाता है और फिर वापस लौटा दिया जाता है। काफ़िरों के अज़ाब में भी दरजात (स्तर) होते हैं — जैसे रसूल ﷺ के चाचा अबू तालिब को हल्का अज़ाब, और अबू लहब की सज़ा हर सोमवार को थोड़ी कम कर दी जाती है। इससे मालूम होता है कि कुफ़्र के बावजूद, अज़ाब में फर्क हो सकता है, मगर हमेशा रहना तय है।

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