Transliteration: (Wassaariqu wassaariqatu faqta'oo aidiyahumaa jazaaa'am bimaa kasabaa nakaalam minal laah; wallaahu 'Azeezun hakeem)
चोरी वह अमल है जिसमें छुपकर किसी ऐसी जगह से माल चुराया जाए जो محفوظ (सुरक्षित) हो। वह सामान जो खुले आम, जैसे मस्जिद में, सड़क या खेत में, या ग़ैर-मुस्लिम जंगी काफ़िले से लिया गया हो, वह शरई चोरी में शामिल नहीं होता। असल उसूल यह है कि जिस चीज़ को हिफ़ाज़त से रखा गया हो — उस जगह से चोरी करने पर ही यह हद की सज़ा लागू होती है। इसी उसूल की बुनियाद पर कई फिक़ही बारीकियाँ निकलती हैं, जिनमें हर चोरी पर हाथ काटने की सज़ा नहीं दी जाती।
चोरी की सज़ा है – हाथ काटना, जबकि ज़िना (व्यभिचार) की सज़ा इससे भी ज़्यादा सख़्त है, लेकिन उसमें जननांगों को नहीं काटा जाता, ताकि नस्ल पैदा करना मुमकिन रहे। क्योंकि चोरी में सिर्फ़ हाथ इस्तेमाल होता है, इसलिए उसी हिस्से को सज़ा दी जाती है।
ज़िना में पूरा जिस्म शरीक होता है, इसलिए उसकी सज़ा ज़्यादा व्यापक होती है।
सामाजिक रूप से यह देखा गया है कि ज़्यादातर ज़िना औरतों से और चोरी मर्दों से मंसूब किया गया है — क्यूँकि औरतों में शहवत और मर्दों में ताक़त या चालाकी ज़्यादा पाई जाती है।
हाथ काटने की सज़ा को उस जुर्म की मुकम्मल सज़ा माना जाता है। अगर चोरी किया गया माल तबाह हो चुका हो या नहीं मिल रहा हो, तो चोर से उसकी भरपाई नहीं ली जाती। लेकिन अगर माल चोर के पास से मिल जाए, तो उसे हक़दार को वापस लौटाना ज़रूरी है।
इससे यह साबित होता है कि सज़ा का मक़सद जुर्म के अमल को रोकना है, और माल की वापसी सामाजिक इंसाफ़ और हक़ की बहाली के लिए होती है।
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