Transliteration: (Innal lazeena kafaroo law anna lahum maa fil ardi jamee'anw wa mislahoo ma'ahoo liyaftadoo bihee min 'azaabi Yawmil Qiyaamati maa tuqubbila minhum wa lahum azaabun aleem)
यह उन लोगों की तरफ़ इशारा है जिन्होंने रसूल अल्लाह ﷺ का इनकार किया, जो कि सबसे बुनियादी और खुला कुफ़्र है। क्योंकि रसूल का इनकार अल्लाह का इनकार है, इसलिए ऐसे लोग ईमान की हद से बाहर हो जाते हैं। यह आयत उस आयत के बाद आई है जिसमें रसूल और औलिया के वसीले की अहमियत बयान की गई थी, और अब यह बताया गया है कि ऐसे वसीलों का इनकार करने वालों के लिए कितनी सख्त सज़ा है।
अगर ये काफ़िर क़ियामत के दिन पूरी ज़मीन की दौलत और उससे दुगनी भी पेश करें ताकि अज़ाब से बच सकें, तो भी उनका फ़िदया क़ुबूल नहीं किया जाएगा। इससे साबित होता है कि दुनियावी माल अल्लाह के यहाँ कुफ़्र और इनकार की तलाईमुल्लाही (इलाही सज़ा) को नहीं रोक सकता। इसके बरअक्स, मोमिनों की सदक़ा और नेकियाँ अल्लाह के यहाँ क़ुबूल होती हैं और अज़ाब में कमी का ज़रिया बनती हैं। इससे ये हक़ीक़त उजागर होती है कि ईमान और नेक अमल ही असल रूहानी दौलत हैं — सिर्फ़ दुनिया की मालदारी से कोई फ़ायदा नहीं होगा।
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