कुरान - 5:34 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ مِن قَبۡلِ أَن تَقۡدِرُواْ عَلَيۡهِمۡۖ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ

Transliteration: (Illal lazeena taaboo min qabli an taqdiroo 'alaihim fa'lamooo annnal laaha Ghafoorur Raheem (section 5))

मगर वे लोग (इस सज़ा से बाहर हैं) जो तुम्हारे क़ाबू में आने से पहले ही तौबा कर लें [115]। और जान लो कि अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला, बेहद रहमत करने वाला है [116]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 34 की तफ़्सीर

 

✅ [115] गिरफ्तारी से पहले की तौबा से सज़ा माफ़

यह आयत पिछली आयत में बताई गई सख़्त सज़ाओं से एक अपवाद (छूट) बताती है।
अगर कोई डाकू या अपराधी गिरफ़्तार होने से पहले सच्चे दिल से तौबा कर ले,
तो उस पर वह शारीरिक सज़ाएं लागू नहीं की जाएंगी जो पहले बयान की गई थीं।
इससे यह साबित होता है कि अल्लाह तौबा की दरवाज़ा बंद नहीं करता,
बल्कि गिरफ़्तारी से पहले की तौबा इंसान को दुनिया की सख़्त सज़ा से भी बचा सकती है।

✅ [116] तौबा की हकीकत और उसका असर

सच्ची तौबा आखिरत की सज़ा से तो बचा ही सकती है,
मगर कुछ दुनियावी सज़ाएं जैसे माल लौटाना या क़िसास (अगर जान ली हो) अब भी लागू हो सकती हैं।
इसलिए तौबा का सबसे असरदार समय गिरफ़्तारी से पहले है,
जिससे दुनियावी और आखिरवी दोनों सज़ाएं माफ़ हो सकती हैं।
यह आयत अल्लाह की माफ़ करने और रहमत करने की खूबी को बयान करती है,
कि जो तौबा करता है, अल्लाह उस पर रहम करता है।

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