Transliteration: (Illal lazeena taaboo min qabli an taqdiroo 'alaihim fa'lamooo annnal laaha Ghafoorur Raheem (section 5))
यह आयत पिछली आयत में बताई गई सख़्त सज़ाओं से एक अपवाद (छूट) बताती है।
अगर कोई डाकू या अपराधी गिरफ़्तार होने से पहले सच्चे दिल से तौबा कर ले,
तो उस पर वह शारीरिक सज़ाएं लागू नहीं की जाएंगी जो पहले बयान की गई थीं।
इससे यह साबित होता है कि अल्लाह तौबा की दरवाज़ा बंद नहीं करता,
बल्कि गिरफ़्तारी से पहले की तौबा इंसान को दुनिया की सख़्त सज़ा से भी बचा सकती है।
सच्ची तौबा आखिरत की सज़ा से तो बचा ही सकती है,
मगर कुछ दुनियावी सज़ाएं जैसे माल लौटाना या क़िसास (अगर जान ली हो) अब भी लागू हो सकती हैं।
इसलिए तौबा का सबसे असरदार समय गिरफ़्तारी से पहले है,
जिससे दुनियावी और आखिरवी दोनों सज़ाएं माफ़ हो सकती हैं।
यह आयत अल्लाह की माफ़ करने और रहमत करने की खूबी को बयान करती है,
कि जो तौबा करता है, अल्लाह उस पर रहम करता है।
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