कुरान - 5:32 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
مِنۡ أَجۡلِ ذَٰلِكَ كَتَبۡنَا عَلَىٰ بَنِيٓ إِسۡرَـٰٓءِيلَ أَنَّهُۥ مَن قَتَلَ نَفۡسَۢا بِغَيۡرِ نَفۡسٍ أَوۡ فَسَادٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ ٱلنَّاسَ جَمِيعٗا وَمَنۡ أَحۡيَاهَا فَكَأَنَّمَآ أَحۡيَا ٱلنَّاسَ جَمِيعٗاۚ وَلَقَدۡ جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُنَا بِٱلۡبَيِّنَٰتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرٗا مِّنۡهُم بَعۡدَ ذَٰلِكَ فِي ٱلۡأَرۡضِ لَمُسۡرِفُونَ

Transliteration: (Min ajli zaalika katabnaa 'alaa Banee Israaa'eela annahoo man qatala nafsam bighairi nafsin aw fasaadin fil ardi faka annammaa qatalan naasa jamee'anw wa man ahyaahaa faka annamaaa ahyan naasa jamee'aa; wa laqad jaaa'at hum Rusulunaa bilbaiyinaati summa inna kaseeram minhum ba'da zaalika fil ardi lamusrifoon)

इसी कारण [108] हमने बनी इसराईल पर यह फ़रमान जारी किया कि जिसने किसी जान को बिना किसी जान के बदले या धरती में फ़साद फैलाने के कारण के बग़ैर क़त्ल किया, तो उसने जैसे पूरी मानवता को क़त्ल कर दिया [109][110]। और जिसने किसी एक की जान बचाई, तो उसने जैसे पूरी मानवता को जीवन दे दिया [111]। और बेशक, हमारे रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, फिर भी उनमें से बहुतों ने इसके बाद धरती में ज़्यादती की [112]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 32 की तफ़्सीर

 

✅ [108] हत्या और ज़ुल्म की गंभीरता

नाजायज़ हत्या कई गुनाहों की जड़ है।
क़ाबील ने जब अपने भाई को मारा, तो वह एक नबी के बेटे होते हुए भी तबाह हो गया।
बनी इसराईल ने भी कई निर्दोषों को मारा, यहाँ तक कि कई नबियों को भी शहीद कर डाला।
इसीलिए अल्लाह ने सख़्त हुक्म दिया कि नाजायज़ क़त्ल हराम है।

✅ [109] बिदअत – गुनाह और नेकियों की ईजाद

नया गुनाह ईजाद करना ख़ुद एक बड़ा गुनाह है, जबकि नई नेक चीज़ (बिदअत-ए-हसनह) का ईजाद करना नेक अमल में शुमार किया गया।
इस आयत में बिदअत-ए-हसनह और बिदअत-ए-सय्याह के बीच फ़र्क की ओर इशारा किया गया है।
क़ातिल को पूरी मानवता का क़ातिल समझा गया, और जिसने जान बचाई, वह दूसरों को प्रेरित करता है, इस तरह उसके आमाल में और भी भलाई जुड़ती जाती है।
यहाँ "फ़साद" से मुराद ऐसे संगीन जुर्म हैं, जिन पर सज़ा-ए-मौत दी जाती है, जैसे कि डाके डालना या दीन से फिर जाना।

✅ [110] हर हत्या की बराबर सज़ा

एक हत्या की सज़ा को पूरी इंसानियत की हत्या के बराबर बताया गया है।
इसमें ख़ून-बहाके बदले (क़िसास) और आख़िरत की सज़ा (जहन्नम, अल्लाह का ग़ज़ब) शामिल हैं।
हालाँकि, गुनाह और सज़ा की प्रकृति हालात के मुताबिक अलग हो सकती है।

✅ [111] जान बचाने का अमल

किसी की जान बचाना सिर्फ मौत से बचाना ही नहीं, बल्कि भूख, प्यास या नाइंसाफ़ी से बचाना भी शामिल है।
इस आयत से यह शिक्षा मिलती है कि एक जान बचाने का सवाब पूरी मानवता को बचाने के बराबर है।
रसूलुल्लाह ﷺ के ज़रिए अल्लाह की रहमतें पहुँचती हैं — इज़्ज़त, माल, ईमान, औलाद, जन्नत और जहन्नम से निजात — सब उन्हीं की वसीला से।

✅ [112] बनी इसराईल के गुनाहों की गंभीरता

नबियों की औलाद होने के बावजूद बनी इसराईल ने बार-बार गुनाह किए।
उन्हें बार-बार रसूल भेजे गए, साफ़ दलीलों के साथ, फिर भी उन्होंने ज़्यादतियों से बाज़ न आए।
इसलिए उन्हें ख़ास तौर पर डांटा गया, क्योंकि उन पर अल्लाह की दलीलें पूरी हो चुकी थीं।

 

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