Transliteration: (Innamaa jazaaa'ul lazeena yuhaariboonal laaha wa Rasoolahoo wa yas'awna fil ardi fasaadan ai yuqattalooo aw yusallabooo aw tuqatta'a aideehim wa arjuluhum min khilaafin aw yunfaw minalard; zaalika lahum khizyun fid dunyaa wa lahum fil Aakhirati 'azaabun 'azeem)
यह आयत बनी उरैना क़बीले की एक दर्दनाक घटना के बाद नाज़िल हुई।
ये लोग मदीना मुनव्वरा आए और इस्लाम कुबूल किया, लेकिन बीमार पड़ गए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें ज़कात में दिए गए ऊँटों का दूध और पेशाब पीने को कहा, जिससे वे ठीक हो गए।
लेकिन बाद में उन्होंने नाफरमानी करते हुए पंद्रह ऊँट चुरा लिए और भाग गए।
हज़रत यास्सार (रज़ि.) को उन्हें वापस लाने भेजा गया, पर उन्होंने क्रूरता से उनके हाथ-पाँव काटकर उन्हें शहीद कर दिया।
बाद में जब वे गिरफ़्तार हुए, तो यह आयत उतरी।
इस आयत में फ़साद फैलाने वालों की सज़ाएं उनके जुर्म के अनुसार दी गई हैं:
ये सज़ाएं समाज में फ़साद रोकने और डर पैदा करने के लिए रखी गई हैं।
ऐसे जुर्म करने वालों को दुनिया में ज़लील और रुस्वा किया जाएगा, ताकि लोग सबक लें।
आख़िरत में उनके लिए सख़्त अज़ाब होगा, जो अल्लाह की सच्ची और अटल इंसाफ़ पर आधारित होगा।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat