कुरान - 5:43 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
وَكَيۡفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِندَهُمُ ٱلتَّوۡرَىٰةُ فِيهَا حُكۡمُ ٱللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوۡنَ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۚ وَمَآ أُوْلَـٰٓئِكَ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Wa kaifa yuhakkimoonaka wa 'indahumut Tawraatu feehaa hukmul laahi summa yatawallawna mim ba'di zaalik; wa maaa ulaaa'ika bilmu'mineen)

"और वे तुम्हें किस तरह हाकिम बनाएंगे, जबकि उनके पास तौरा है, जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है? फिर भी वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं, और वे ईमान नहीं लाते [138]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 43 की तफ़्सीर

✅ [138] अल्लाही शरीअत को छोड़कर आसानी की तलाश

इस आयत में अल्लाह तआला ने यहूद की मुनाफ़िक़त और दोगलेपन को बेनक़ाब किया है।
"तौरा उनके पास है जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है" — यानी जब उनकी अपनी किताब (तौरा) में हुक्म साफ़-साफ़ लिखा हुआ है, जैसे कि ज़िना (व्यभिचार) की सज़ा 'रज्म' (पत्थरों से मार कर क़त्ल) है, तो फिर वे तुम्हें (रसूल ﷺ) हाकिम क्यों बना रहे हैं?

इसका जवाब भी खुद आयत में है:

"फिर भी वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं" — यानी तौरा में हुक्म जानने के बावजूद जब वह उनकी नफ़्सानी ख़्वाहिश के ख़िलाफ़ होता है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं।

इस आयत का मफ़हूम यह है कि:

  • वे रसूल ﷺ के पास इंसाफ़ लेने के लिए नहीं, बल्कि नर्मी और रियायत की उम्मीद में आए थे।
  • उन्हें उम्मीद थी कि शायद रसूल ﷺ कोई हल्का हुक्म देंगे, जिससे उनकी नाक बच जाए और सज़ा से छूट मिल जाए।
  • यह सच्चे ईमानदारों का रवैया नहीं, बल्कि मुनाफ़िक़ों और दुनिया-परस्तों का रवैया है जो दीन को अपनी मर्ज़ी से अपनाते हैं, जब मुफीद लगे तो मानते हैं, और जब ज़रूरत के ख़िलाफ़ हो तो इंकार कर देते हैं।

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