Transliteration: (Wa katabnaa 'alaihim feehaaa annan nafsa binnafsi wal'aina bil'aini wal anfa bilanfi wal uzuna bil uzuni wassinna bissinni waljurooha qisaas; faman tasaddaqa bihee fahuwa kaffaaratul lah; wa mal lam yahkum bimaaa anzalal laahu fa ulaaa'ika humuz zalimoon)
जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, और दाँत के बदले दाँत — यह हुक्म तौरात में दिया गया था। इसका मक़सद इंसाफ़ और न्याय को क़ायम करना था ताकि कोई ज़्यादती न हो और हर किसी को उसके नुकसान के बराबर बदला मिले।
ज़ख्मों में भी बराबरी का बदला है — इसका मतलब है कि इंसाफ़ में हद से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, बल्कि जो नुक़सान हुआ है उसी के बराबर बदला लेना चाहिए।
अगर पीड़ित पक्ष दिल से ख़ुशी के साथ माफ़ कर दे, तो यह एक उच्च नैतिक गुण माना गया है। यह माफ़ी मजबूरी में नहीं बल्कि पूरे दिल से होनी चाहिए।
जो व्यक्ति माफ़ करता है, उसके लिए यह माफ़ी उसके गुनाहों के लिए कफ़्फ़ारा बन जाती है। यह अल्लाह की तरफ़ से पाकीज़गी और इनाम का वादा है।
जो लोग अल्लाह के नाज़िल किए गए हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला नहीं करते, वे एक गंभीर ग़लती करते हैं और दीन से हटते हैं।
ऐसे लोग जो जानबूझकर अल्लाह के हुक्मों की अनदेखी करते हैं, उन्हें ज़ालिम कहा गया है। यह इंसाफ़ की खिलाफ़वर्जी और अत्याचार का प्रमाण है।
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