कुरान - 5:45 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
وَكَتَبۡنَا عَلَيۡهِمۡ فِيهَآ أَنَّ ٱلنَّفۡسَ بِٱلنَّفۡسِ وَٱلۡعَيۡنَ بِٱلۡعَيۡنِ وَٱلۡأَنفَ بِٱلۡأَنفِ وَٱلۡأُذُنَ بِٱلۡأُذُنِ وَٱلسِّنَّ بِٱلسِّنِّ وَٱلۡجُرُوحَ قِصَاصٞۚ فَمَن تَصَدَّقَ بِهِۦ فَهُوَ كَفَّارَةٞ لَّهُۥۚ وَمَن لَّمۡ يَحۡكُم بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ فَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ

Transliteration: (Wa katabnaa 'alaihim feehaaa annan nafsa binnafsi wal'aina bil'aini wal anfa bilanfi wal uzuna bil uzuni wassinna bissinni waljurooha qisaas; faman tasaddaqa bihee fahuwa kaffaaratul lah; wa mal lam yahkum bimaaa anzalal laahu fa ulaaa'ika humuz zalimoon)

और हमने (अल्लाह ने) उनके ऊपर फ़र्ज़ किया तौरात में कि जान के बदले जान, और आँख के बदले आँख, और नाक के बदले नाक, और कान के बदले कान, और दाँत के बदले दाँत है। और ज़ख्मों में भी बराबरी का बदला है [143]। फिर जो कोई माफ़ कर दे दिल से ख़ुशी के साथ [145], तो वह उसके लिए उसके गुनाह का कफ़्फ़ारा होगा [146]। और जो लोग फ़ैसला नहीं करते उस चीज़ के मुताबिक़ जो अल्लाह ने नाज़िल की है [147], तो वही लोग ज़ालिम हैं [148]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 45 की तफ़्सीर

 

✅ [143] तौरात में बदले का क़ानून

जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, और दाँत के बदले दाँत — यह हुक्म तौरात में दिया गया था। इसका मक़सद इंसाफ़ और न्याय को क़ायम करना था ताकि कोई ज़्यादती न हो और हर किसी को उसके नुकसान के बराबर बदला मिले।

✅ [144] ज़ख्मों का बराबर बदला

ज़ख्मों में भी बराबरी का बदला है — इसका मतलब है कि इंसाफ़ में हद से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, बल्कि जो नुक़सान हुआ है उसी के बराबर बदला लेना चाहिए।

✅ [145] दिल से ख़ुशी के साथ माफ़ करना

अगर पीड़ित पक्ष दिल से ख़ुशी के साथ माफ़ कर दे, तो यह एक उच्च नैतिक गुण माना गया है। यह माफ़ी मजबूरी में नहीं बल्कि पूरे दिल से होनी चाहिए।

✅ [146] माफ़ करना गुनाहों का कफ़्फ़ारा है

जो व्यक्ति माफ़ करता है, उसके लिए यह माफ़ी उसके गुनाहों के लिए कफ़्फ़ारा बन जाती है। यह अल्लाह की तरफ़ से पाकीज़गी और इनाम का वादा है।

✅ [147] अल्लाह के हुक्म के अनुसार फ़ैसला न करना

जो लोग अल्लाह के नाज़िल किए गए हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला नहीं करते, वे एक गंभीर ग़लती करते हैं और दीन से हटते हैं।

✅ [148] ऐसे लोग ज़ालिम हैं

ऐसे लोग जो जानबूझकर अल्लाह के हुक्मों की अनदेखी करते हैं, उन्हें ज़ालिम कहा गया है। यह इंसाफ़ की खिलाफ़वर्जी और अत्याचार का प्रमाण है।

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