कुरान - 5:44 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
إِنَّآ أَنزَلۡنَا ٱلتَّوۡرَىٰةَ فِيهَا هُدٗى وَنُورٞۚ يَحۡكُمُ بِهَا ٱلنَّبِيُّونَ ٱلَّذِينَ أَسۡلَمُواْ لِلَّذِينَ هَادُواْ وَٱلرَّبَّـٰنِيُّونَ وَٱلۡأَحۡبَارُ بِمَا ٱسۡتُحۡفِظُواْ مِن كِتَٰبِ ٱللَّهِ وَكَانُواْ عَلَيۡهِ شُهَدَآءَۚ فَلَا تَخۡشَوُاْ ٱلنَّاسَ وَٱخۡشَوۡنِ وَلَا تَشۡتَرُواْ بِـَٔايَٰتِي ثَمَنٗا قَلِيلٗاۚ وَمَن لَّمۡ يَحۡكُم بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ فَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡكَٰفِرُونَ

Transliteration: (Innaaa anzalnat Tawraata feehaa hudanw wa noor; yahkumu bihan Nabiyyoonal lazeena aslamoo lillazeena haadoo war rabbaaniyyoona wal ahbaaru bimas tuhfizoo min Kitaabil laahi wa kaanoo 'alaihi shuhadaaa'; falaa takhshawun naasa wakhshawni wa laa tashtaroo bi aayaatee samanan qaleelaa; wa mal lam yahkum bimaaa anzalal laahu fa ulaaa'ika humul kaafiroon)

"हमने तौरा नाज़िल की, जिसमें हिदायत और नूर था। उसके मुताबिक़ यहूद को हुक्म दिया गया था हमारे फ़रमाबरदार नबियों, आलिमों और फिक़्ह के जानकारों के ज़रिए [139]। उनसे किताबे इलाही की हिफ़ाज़त का अहद लिया गया था, और वे उस पर गवाह भी थे [140]। तो (ऐ लोगो!) तुम लोगों से न डरो, बल्कि मुझसे डरो, और मेरी आयतों के बदले थोड़ा सा मोल न लो [141]। और जो कोई अल्लाह के नाज़िल किए हुए हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला न करे, तो ऐसे लोग काफ़िर हैं [142]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायदा – आयत 44 की तफ़्सीर

 

✅ [139] तौरा: हिदायत और नूर से भरपूर आसमानी किताब

"हमने तौरा नाज़िल की, जिसमें हिदायत और नूर था..."

  • इस आयत में अल्लाह तआला ने तौरा की इलाही हैसियत और रहनुमाई के किरदार को बयान किया है।
  • तौरा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई थी, लेकिन इसके मुताबिक़ बनी इस्राईल के बाद के नबी, उलमा और क़ाज़ी भी हुक्म देते रहे।
  • यह ज़रूरी नहीं होता कि हर नबी नई किताब लाए। इस्लाम में चार ही किताबें मानी गई हैं: तौरा, ज़बूर, इंजील, और क़ुरआन।
  • जिन हुक्मों की तौसीक़ क़ुरआन और हदीस से होती है, वे आज भी शरीअत का हिस्सा हैं।

✅ [140] इल्मी लोगों की ज़िम्मेदारी: किताब की हिफ़ाज़त करना

"उनसे किताबे इलाही की हिफ़ाज़त का अहद लिया गया था, और वे उस पर गवाह भी थे..."

  • बनी इस्राईल के उलमा और मुफ़्ती इस जिम्मेदारी में थे कि वे अल्लाह की किताब की न सिर्फ़ लिखाई, बल्कि माना और हुक्म की भी हिफ़ाज़त करें।
  • यह आयत हर दौर के उलमा को याद दिलाती है कि इल्मी अमानत को निभाना और हक़ बयान करना उनका फ़र्ज़ है।

✅ [141] क़ुरआनी हुक्मों को बेचने से मना

"तो मुझसे डरो, और मेरी आयतों के बदले थोड़ा सा मोल न लो..."

  • यानी दुनियावी फायदा, रुतबा, या लोगों की खुशी के लिए अल्लाह के हुक्मों में तग़य्युर करना या सच्चाई छुपाना सख़्त गुनाह है।
  • इससे मुराद यह नहीं कि दीन सिखाने के बदले तनख़्वाह लेना हराम है। बल्कि मर्ज़ या इलाज के तौर पर वज़ीफ़े के बदले कुछ लेना भी जाइज है, जैसा कि सहाबी ने सूरह फ़ातिहा से इलाज किया और ईनाम क़ुबूल किया।

✅ [142] अल्लाह के हुक्म के बिना फ़ैसला = कुफ़्र

"और जो कोई अल्लाह के नाज़िल किए हुए हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला न करे, तो ऐसे लोग काफ़िर हैं।"

  • इसका मतलब यह है कि जो शख़्स जानबूझ कर, अहकामे इलाही को ठुकराकर, अपने बनाए क़ानून या ग़ैर-इलाही निज़ाम को बेहतर समझे—वह काफ़िर है।
  • लेकिन अगर कोई मज़बूरी या जब्र में गैर-इस्लामी क़ानून पर अमल करे (जैसे किसी सरकारी अफसर को करना पड़े), तो वह इस हुक्म में नहीं आता।
  • इस आयत में नीयत और यक़ीन को मापदंड बनाया गया है। कानूनी अमल से ज़्यादा अहमियत अक़ीदे की है।

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