Transliteration: (Wa anih kum bainahum bimaaa anzalal laahu wa laa tattabi' ahwaaa'ahum wahzarhum ai yaftinooka 'am ba'di maaa anzalal laahu ilaika fa in tawallaw fa'lam annamaa yureedul laahu ai yuseebahum biba'di zunoobihim; wa inna kaseeram minan naasi lafaasiqoon)
उस चीज़ के मुताबिक़ जो अल्लाह ने नाज़िल की है — यानी फ़ैसले क़ुरआन, हदीस, उम्मत का इज्मा और क़ियास जैसे शरई उसूलों के अनुसार होने चाहिए। यही इलाही हुक्म है जो हर हाल में लागू होता है।
और उनकी ख्वाहिशों की पैरवी न करें — मुआमलात और फ़ैसलों में दूसरों की निजी इच्छाओं या पक्षपातपूर्ण दबाव को न मानो। इससे हक़ से हटने का ख़तरा होता है।
और उनसे होशियार रहो — मुनाफ़िक़ और ग़ैर-मुस्लिम धोखेबाज़ी, चालाकी या फुसलाने की कोशिश कर सकते हैं। यहाँ तक कि रसूल ﷺ को भी आगाह किया गया, जिससे यह बात और ज़्यादा अहमियत रखती है।
अगर वे मुँह मोड़ें, तो समझ लो कि यह अल्लाह की तरफ़ से सज़ा का कारण बन रहा है। यह उनके गुनाहों का नतीजा है। जो लोग इलाही हुक्म को ठुकराते हैं, वे अज़ाब के हक़दार होते हैं।
बहुत से लोग हैं जो हद से बढ़ने वाले हैं — यानी दुनिया में ज़्यादातर लोग इलाही हदों को पार करते हैं, और शरई हुक्मों को नज़रअंदाज़ करते हैं। इसलिए हर मोमिन को सतर्क रहना चाहिए।
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