कुरान - 5:48 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

48
وَأَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ مُصَدِّقٗا لِّمَا بَيۡنَ يَدَيۡهِ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمُهَيۡمِنًا عَلَيۡهِۖ فَٱحۡكُم بَيۡنَهُم بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُۖ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَهُمۡ عَمَّا جَآءَكَ مِنَ ٱلۡحَقِّۚ لِكُلّٖ جَعَلۡنَا مِنكُمۡ شِرۡعَةٗ وَمِنۡهَاجٗاۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَكُمۡ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ وَلَٰكِن لِّيَبۡلُوَكُمۡ فِي مَآ ءَاتَىٰكُمۡۖ فَٱسۡتَبِقُواْ ٱلۡخَيۡرَٰتِۚ إِلَى ٱللَّهِ مَرۡجِعُكُمۡ جَمِيعٗا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ فِيهِ تَخۡتَلِفُونَ

Transliteration: (Wa anzalnaa ilaikal Kitaaba bilhaqqi musaddiqallimaa baina yadaihi minal Kitaabi wa muhaiminan 'alaihi fahkum bainahum bimaa anzalal laahu wa laa tattabi' ahwaaa'ahum 'ammaa jaaa'aka minal haqq; likullin ja'alnaa minkum shir'atanw wa minhaajaa; wa law shaaa'al laahu laja'alakum ummatanw waahidatanw wa laakil liyabluwakum fee maa aataakum fastabiqul khairaat; ilal laahi marji'ukum jamee'an fayunab bi'ukum bimaa kuntum feehi takhtalifoon)

और (ऐ प्यारे नबी) हमने तुम्हारी तरफ़ हक़ीकी किताब नाज़िल की, जो इससे पहले की किताबों की तसदीक़ करने वाली है, और उन पर निगरान और गवाह भी है [154]। तो आप उनके बीच फ़ैसला कीजिए उस चीज़ के मुताबिक़ जो अल्लाह ने नाज़िल की है [155]। ऐ सुनने वाले! उनकी ख्वाहिशों की पैरवी न करना जो हक़ से हटकर तुम्हारे पास आया है [156]। हम ने तुम में से हर एक के लिए एक शरीअत और एक रास्ता मुक़र्रर किया है [157]। और अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक उम्मत बना देता [158], लेकिन वह चाहता है कि तुम्हें आज़माए उस चीज़ में जो उसने तुम्हें दी है [159]। तो नेकियों में एक-दूसरे से आगे बढ़ो। तुम सबको अल्लाह की तरफ़ लौटना है, फिर वह तुम्हें बताएगा जिन बातों में तुम झगड़ते थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 48 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 48 की तफ़्सीर

 

✅ [154] क़ुरआन: सच्ची किताब और पहले ग्रंथों की तसदीक़ करने वाली

हमने तुम्हारी तरफ़ हक़ीकी किताब नाज़िल की — यानी क़ुरआन वह असली और सच्चा ग्रंथ है जो पहले नाज़िल की गई किताबों की तसदीक़ करता है और उनके ऊपर निगरान और गवाह के तौर पर आया है। इससे यह साबित होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ को पहले आसमानी किताबों का पूरा इल्म दिया गया।

✅ [155] अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला करना

तो आप उनके बीच फ़ैसला कीजिए उस चीज़ के मुताबिक़ जो अल्लाह ने नाज़िल की है — हर मामले में इलाही क़ानून के अनुसार फ़ैसला ज़रूरी है, चाहे वह मुसलमानों का मामला हो या ग़ैर-मुस्लिमों का। यही क़ानून हक़ और अद्ल का ज़रिया है।

✅ [156] हक़ को छोड़ने वाली ख्वाहिशों की पैरवी न करो

उनकी ख्वाहिशों की पैरवी न करना — यानी फ़ैसला करते वक़्त रिश्वत, जात-पात, पसंद-नापसंद या दुनिया की लालच में आकर हक़ को न छोड़ो। इस हिदायत का ताअल्लुक़ हर मुसलमान से है, सिर्फ़ हाकिम से नहीं।

✅ [157] हर उम्मत के लिए शरीअत और रास्ता मुक़र्रर

हर एक के लिए एक शरीअत और एक रास्ता — पहले नबियों की शरीअतें बुनियादी अकीदों में एक जैसी थीं, मगर फ़रई (विस्तृत) अहकाम अलग-अलग थे। अब क़ुरआन की शरीअत आख़िरी और सबके लिए आम है।

✅ [158–159] अलग-अलग उम्मतों का हिकमत भरा इंतज़ाम

अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक उम्मत बना देता — मगर उसने तुम्हें अलग-अलग शरीअतों के ज़रिए आज़माने के लिए भेजा, ताकि यह देखा जाए कि कौन उसका हुक्म मानता है और कौन इंकार करता है। इस फ़र्क़ को झगड़े का ज़रिया नहीं बनाना चाहिए बल्कि नेकियों में आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

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