Transliteration: (Afahukmal jaahiliyyati yabghoon; wa man ahsanu minal laahi hukmal liqawminy yooqinoon)
जाहिलियत के ज़माने का फ़ैसला चाहते हैं? — यह उन पुराने दौर की क़ौमी रस्मों और न्याय में पक्षपात की तरफ़ इशारा है, जो इस्लाम से पहले आम थीं। एक मिसाल मदीना के दो क़बीलों — बनी नज़ीर और बनी कुरैज़ा — की है, जहाँ ताक़तवर क़बीला अपने लोगों के लिए दोगुनी दीयत लेता और दूसरे के लिए आधी देता था। रसूलुल्लाह ﷺ ने बराबरी का हुक्म दिया, मगर बनी नज़ीर ने इस्लामी फ़ैसले को ठुकरा दिया।
और अल्लाह से बेहतर फ़ैसला करने वाला कौन हो सकता है — अल्लाह का हुक्म न्याय, हक़ और बिना किसी पक्षपात के होता है। जो लोग सच्चे यक़ीन वाले हैं, वे जानते हैं कि अल्लाह का फ़ैसला ही सबसे बेहतर और इंसाफ़ वाला होता है। इस आयत में उन लोगों की निंदा की गई है जो इलाही हुक्म छोड़कर क़बीलाई या निजी रस्मों को तरजीह देते हैं।
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