कुरान - 5:84 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

84
وَمَا لَنَا لَا نُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَمَا جَآءَنَا مِنَ ٱلۡحَقِّ وَنَطۡمَعُ أَن يُدۡخِلَنَا رَبُّنَا مَعَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلصَّـٰلِحِينَ

Transliteration: (Wa maa lanaa laa nu'minu billaahi wa maa jaaa'anaa minal haqqi wa natma'u ai yudkhilanaa Rabbunaa ma'al qawmis saaliheen)

और हमें क्या हुआ है कि हम अल्लाह पर और उस सच्चाई पर ईमान न लाएँ, जो हमारे पास आई है, जबकि हम यह आशा रखते हैं कि हमारा रब हमें नेक लोगों के साथ जन्नत में दाख़िल करेगा [238]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 84 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 84 की तफ़्सीर

✅ [238] हक़ को स्वीकार करने के बाद ईमान लाना फ़ितरी है

जब सच्चाई सामने आ जाए, तो उस पर ईमान लाना और नेक लोगों की सोहबत की तम्मना रखना एक स्वाभाविक (फ़ितरी) अमल है।

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