Transliteration: (Ara 'aytal lazee yukazzibu biddeen )
सूरत मआउन के नाज़िल होने का कारण
(Surah Ma'oon ka Nazil Hone Ka Karan)
सूरत मआउन का नज़ूल मक्का के कुछ अमीर (wealthy) और प्रभावशाली (influential) लोगों द्वारा अनाथों के साथ किए गए शोषण (exploitation) और दुर्व्यवहार (mistreatment) के जवाब में हुआ, जैसे कि अबू जहल (Abu Jahl) और आस बिन वाईल (Aas bin Waa'il)। इसके नाज़िल होने का खास कारण निम्नलिखित है:
जब मक्का में कोई अमीर व्यक्ति मौत के क़रीब (on his deathbed) होता, तो अबू जहल और अन्य ऐसे लोग उसके पास आते और यह वादा करते कि वे उसकी संपत्ति (wealth) और बच्चों (children) का ख्याल (care) रखेंगे। वे यह भरोसा (assurance) दिलाते कि बच्चों का ठीक से पालन-पोषण (proper upbringing) होगा और संपत्ति को सही तरीके से संभाला जाएगा (managed responsibly)। लेकिन जब वह व्यक्ति मर जाता, तो ये लोग उसकी संपत्ति पर पूरी तरह से क़ब्ज़ा (take control) कर लेते, लेकिन अनाथ (orphans) बच्चों को बेरहमी से बाहर निकाल देते और उनके अधिकारों (rights) और भलाई (welfare) की अनदेखी (neglect) करते।
ऐसा ही एक अनाथ, जो इस दुर्व्यवहार का शिकार (victim) हुआ, अपनी शिकायत (complaint) लेकर नबी ﷺ के पास गया। नबी ﷺ उस अनाथ की स्थिति से बेहद प्रभावित (moved) होकर उसके साथ उन अपराधियों (perpetrators) के पास गए और उनसे पूछा, "क्या तुम अल्लाह (Allah) और क़ियामत (Day of Judgment) के दिन से नहीं डरते?" लेकिन इन लोगों ने क़ियामत के विचार (concept) का मजाक (mockery) उड़ाया और अपने किए (actions) पर कोई अफसोस (remorse) नहीं जताया।
उनकी बेरुखी (response) का जवाब देते हुए, नबी ﷺ मायूस (dejected) होकर लौट आए। उनके इस क्रूर (cruel) व्यवहार और अनाथों की भलाई (welfare) की अनदेखी के जवाब में सूरत मआउन की पहली आयत नाज़िल हुई, जो इस प्रकार के व्यवहार की निंदा (condemnation) करती है और जो लोग ईमान (faith) और नेक कार्यों (righteous deeds) को नकारते हैं, उनकी विशेषताओं (characteristics) को उजागर (highlight) करती है। यह सूरत अनाथों, गरीबों (needy) और सच्चे ईमान (true faith) की अहमियत (importance) के बारे में एक चेतावनी (warning) के रूप में नाज़िल हुई।
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