Transliteration: (Wa la yahuddu 'alaa ta'aamil miskeen )
आयत का व्याख्या (Explanation of the Ayat):
यह आयत उन व्यक्तियों के कृत्यों की ओर इशारा करती है जो अनाथों (orphans) पर अत्याचार (oppression) करते हैं और उनकी संपत्ति हड़पते हैं (seize). इस आयत में ध्यान उन व्यक्तियों पर केंद्रित है जो कियामत (Day of Judgement) के परिणामों को नकारते हैं, जिसके कारण वे कमजोर (weak) और असहाय (helpless) लोगों के प्रति अन्यायपूर्ण (unjust) कृत्य करते हैं। यदि वे उस दिन अपनी स्वयं की कमजोरी (vulnerability) को याद रखते, तो वे अनाथों पर अत्याचार (oppressing orphans) करने और अन्य गलत कार्यों (wrongdoings) से बचते।
मुख्य बिंदु (Key Points):
अनाथों पर अत्याचार और कियामत के दिन का नकारना (Oppressing Orphans as a Sign of Rejecting the Day of Judgement): यह आयत अनाथों (orphans) पर अत्याचार (oppression) और कियामत (Day of Judgement) के दिन के नकारने (denial) के बीच संबंध स्थापित करती है। कमजोर (weak) और असहाय (helpless) का शोषण (exploitation) करना कियामत (Day of Judgement) के परिणामों को नकारने (denying) का स्पष्ट संकेत है। यदि व्यक्तियों को अपने कार्यों (actions) के परिणामों (consequences) का विश्वास होता, तो वे इस प्रकार के अन्याय (injustice) से बचते।
सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility for All): यह आयत यह भी संकेत देती है कि अविश्वासी (infidels) भी सामाजिक जिम्मेदारियों (social responsibilities) और नैतिक आचरण (ethical conduct) के लिए बाध्य (bound) हैं। इसका मतलब है कि एक इस्लामी राज्य (Islamic state) में, राज्य प्रमुख (head of state) ऐसे अपराधों (crimes) को रोकने के लिए कानून बनाएंगे जैसे अत्याचार (oppression), चोरी (theft) और शोषण (exploitation)। इस प्रकार, वे लोग जो बाद के जीवन (Hereafter) में विश्वास (belief) नहीं करते, उन्हें इस दुनिया (world) में भी उनके कृत्यों (actions) के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा और वे अपनी गलतियों (misdeeds) के लिए आखिरत (Hereafter) में भी सजा (punishment) पाएंगे।
कियामत के दिन की जागरूकता और न्यायपूर्ण आचरण (Awareness of the Day of Judgement and Ethical Conduct): यह आयत यह सिद्ध करती है कि कियामत (Day of Judgement) के दिन की जागरूकता (awareness) को एक व्यक्ति के आचरण (conduct) और नैतिकता (ethics) को आकार देना चाहिए, और यह केवल आस्तिकों (believers) के लिए नहीं, बल्कि नास्तिकों (non-believers) के लिए भी समाज (society) में न्यायपूर्वक (justly) कार्य (act) करने का संदेश देती है।
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