कुरान - 107:2 सूरह अल-माउन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
فَذَٰلِكَ ٱلَّذِي يَدُعُّ ٱلۡيَتِيمَ

Transliteration: (Fazaalikal lazee yadu'ul-yateem )

2. वह है जो अनाथ को दूर करता है (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-माउन आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह का व्याख्या (Explanation of the Verse):

यहाँ "धर्म" से मतलब विशेष रूप से इस्लाम धर्म से है, या इसे प्रलय के दिन (Day of Judgement) के रूप में भी समझा जा सकता है। "झुठलाना" का मतलब है न केवल शब्दों से नकारना, बल्कि असल में सही बात को न मानना (deny). यह आयत उन लोगों की निंदा करती है, जैसे अबू जहल और अन्य, जो न सिर्फ इस्लाम के सत्य को मुँह से नकारते थे, बल्कि अनाथों के साथ बुरा बर्ताव भी करते थे, जो उनके इनकार का असल प्रमाण था।

मुख्य बिंदु (Key Points):

इस्लाम और प्रलय के दिन में विश्वास (Belief in Islam and the Day of Judgement): इस आयत में उन लोगों के गहरे इनकार (denial) को बताया गया है, जैसे अबू जहल, जिन्होंने इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों और प्रलय के दिन को नकारा। उनका इनकार (denial) केवल शब्दों में नहीं था, बल्कि उनके कृत्य (actions) इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ थे।

शोषण के द्वारा अस्वीकृति (Practical Denial through Oppression): यह आयत यह भी बताती है कि उनका इनकार (denial) अनाथों के साथ उनके बर्ताव (behavior) से कैसे दिखता था। ये लोग न केवल शब्दों से विश्वास (faith) को नकारते थे, बल्कि अपने कामों (actions) से भी यह दिखाते थे कि वे समाज के कमजोर लोगों, जैसे अनाथों, को बिल्कुल तवज्जो नहीं देते थे।

कुफ्र (Infidelity) की गंभीरता (The Severity of Infidelity): कुफ्र (infidelity) को सबसे बड़ा पाप (sin) माना जाता है, क्योंकि यह न केवल शब्दों से, बल्कि असल में सत्य (truth) को नकारने (denying) का तरीका होता है। अबू जहल के कृत्य (actions) एक उदाहरण हैं, जो इस तरह के इनकार (denial) के खतरनाक परिणामों को दिखाते हैं, जो समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ बुरा बर्ताव करने (mistreating) के रूप में प्रकट होते हैं।

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