कुरान - 23:37 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
إِنۡ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنۡيَا نَمُوتُ وَنَحۡيَا وَمَا نَحۡنُ بِمَبۡعُوثِينَ

Transliteration: (In hiya illaa hayaatunad dunyaa namootu wa nahyaa wa maa nahnu bimab'ooseen)

37. हमारी यह दुनियावी ज़िन्दगी ही सब कुछ है; हम यहीं मरते हैं और यहीं जीते हैं [58], और हम हरगिज़ दोबारा नहीं उठाए जाएंगे [59]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 37 की तफ़सीर

"हमारी यह दुनियावी ज़िन्दगी ही सब कुछ है; हम यहीं मरते हैं और यहीं जीते हैं [58], और हम हरगिज़ दोबारा नहीं उठाए जाएंगे [59];"

[58-59] दह्रियत (भौतिकवाद) और आख़िरत का इनकार

उनका अक़ीदा यह था कि इंसान सिर्फ़ दुनियावी गर्दिश का नाम है—एक नस्ल मरती है और दूसरी पैदा होती है, इसके पीछे कोई हिसाब-किताब या आख़िरत नहीं है। यह दह्रियों और मुल्हिदों की पुरानी फ़िक्र है जो रूह और आख़िरत की मुन्किर है।

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