Transliteration: (Wa qul Rabbigh fir warham wa Anta khairur raahimeen (section 6))
"और आप दुआ कीजिए, 'ऐ मेरे रब! बख़्श दे [163] और रहम फ़रमा, और तू ही सबसे बेहतरीन रहम फ़रमाने वाला है!'"
यह सूरह अल-मोमिनून का इख़्तिताम एक निहायत जामेअ और मुबारक़ दुआ पर होता है। हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ को मग़फ़िरत (गुनाहों की मुआफ़ी) और रहमत (नेअमतों व बरकतों के हुसूल) की दुआ सिखाकर पूरी उम्मत को यह दर्स दिया गया कि इंसान का सहारा सिर्फ़ अल्लाह की मग़फ़िरत और उसकी बेपनाह रहमत है।
हुज़ूर ﷺ का यह दुआ फ़रमाना उम्मत की शफ़ाअत और उनकी बख़्शिश के लिए है। और 'ख़ैरुर-राहिमीन' का ख़ात्मा यह यक़ीन दिलाता है कि अल्लाह से बढ़कर कोई मेहरबान और रहम फ़रमाने वाला नहीं।
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