कुरान - 23:115 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

115
أَفَحَسِبۡتُمۡ أَنَّمَا خَلَقۡنَٰكُمۡ عَبَثٗا وَأَنَّكُمۡ إِلَيۡنَا لَا تُرۡجَعُونَ

Transliteration: (Afahasibtum annamaa khalaqnaakum 'abasanw wa annakum ilainaa laa turja'oon)

तो क्या तुमने यह समझ रखा था कि हमने तुम्हें बेमक़सद (बेकार) पैदा किया है [157], और यह कि तुम हमारी तरफ़ कभी वापस नहीं लाए जाओगे [158]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 115 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 115

"तो क्या तुमने यह समझ रखा था कि हमने तुम्हें बेमक़सद पैदा किया है [157], और यह कि तुम हमारी तरफ़ कभी वापस नहीं लाए जाओगे [158]?"

[157] तख़्लीक़-ए-इंसानी का अज़ीम मक़सद

अल्लाह तआला ने इंसान को खेल-तमाशे या बेमक़सद नहीं बनाया, बल्कि अपनी मारिफ़त, इबादत और आज़माइश के लिए पैदा फ़रमाया है। जो लोग बेफ़िक्र होकर गुनाहों में ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, यह आयत उनके ग़फ़लत भरे ख़यालात को झकझोरती है।

[158] अल्लाह की तरफ़ वापसी की यक़ीनियत

हर इंसान को मरकर दोबारा ज़िन्दा होना है और अल्लाह के हुज़ूर अपने एक-एक अमल का हिसाब देना है। इस वापसी से कोई बच नहीं सकता।

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